जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · काम और मेहनत

“काम में मन नहीं लगता, सब टालता रहता हूँ — क्या करूँ?”

गीता का छोटा जवाब

गीता आलस्य और टालने को “तामस” सुख कहती है — जो शुरू में आराम देता है और अंत में मन को भारी कर देता है। कृष्ण का सीधा कहना है: कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है — उठो, और संतुलन के साथ अपना कर्तव्य करो।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. टालना किस तरह का सुख है

    जो सुख नींद, आलस्य और प्रमाद से मिलता है — शुरू से अंत तक मन को मोह में रखता है — वह तामस है।

    गीता 18.39 श्रीकृष्ण

    यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
    निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥

    हिंदी अर्थनिद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।

    रोमन में पढ़ें

    yad agre chānubandhe cha sukhaṁ mohanam ātmanaḥ
    nidrālasya-pramādotthaṁ tat tāmasam udāhṛitam

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  2. पहला कदम: उठना

    हृदय की इस दुर्बलता को छोड़ो और उठो।

    गीता 2.3 श्रीकृष्ण

    क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
    क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥

    हिंदी अर्थहे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो; क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परंतप ! हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्धके लिये खड़े हो जाओ।

    रोमन में पढ़ें

    klaibyaṁ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayyupapadyate
    kṣhudraṁ hṛidaya-daurbalyaṁ tyaktvottiṣhṭha parantapa

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  3. करना, न करने से बेहतर

    अपना नियत कर्म करो; कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है।

    गीता 3.8 श्रीकृष्ण

    नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
    शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

    हिंदी अर्थतू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।

    रोमन में पढ़ें

    niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ
    śharīra-yātrāpi cha te na prasiddhyed akarmaṇaḥ

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  4. बिना बोझ के कर्म

    आसक्ति के बिना, कर्तव्य समझकर कर्म करने वाला ऊँचा उठता है।

    गीता 3.19 श्रीकृष्ण

    तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
    असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

    हिंदी अर्थइसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    tasmād asaktaḥ satataṁ kāryaṁ karma samāchara
    asakto hyācharan karma param āpnoti pūruṣhaḥ

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  5. संतुलन भी ज़रूरी

    बहुत ज़्यादा या बहुत कम — खाना, सोना, काम — दोनों ठीक नहीं। संतुलित दिनचर्या वाले का योग दुख मिटाता है।

    गीता 6.16 श्रीकृष्ण

    नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
    न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

    हिंदी अर्थहे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है।

    रोमन में पढ़ें

    nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ
    na chāti-svapna-śhīlasya jāgrato naiva chārjuna

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
    गीता 6.17 श्रीकृष्ण

    युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
    युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

    हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

    रोमन में पढ़ें

    yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu
    yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि थकान को नज़रअंदाज़ करके खुद को घसीटते रहो। वह संतुलन के साथ नियमित कर्म की बात करती है।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।