“काम में मन नहीं लगता, सब टालता रहता हूँ — क्या करूँ?”
गीता का छोटा जवाब
गीता आलस्य और टालने को “तामस” सुख कहती है — जो शुरू में आराम देता है और अंत में मन को भारी कर देता है। कृष्ण का सीधा कहना है: कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है — उठो, और संतुलन के साथ अपना कर्तव्य करो।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
टालना किस तरह का सुख है
जो सुख नींद, आलस्य और प्रमाद से मिलता है — शुरू से अंत तक मन को मोह में रखता है — वह तामस है।
गीता 18.39श्रीकृष्ण
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
हिंदी अर्थनिद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।
रोमन में पढ़ें
yad agre chānubandhe cha sukhaṁ mohanam ātmanaḥ
nidrālasya-pramādotthaṁ tat tāmasam udāhṛitam
हिंदी अर्थहे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो; क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परंतप ! हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्धके लिये खड़े हो जाओ।
अपना नियत कर्म करो; कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है।
गीता 3.8श्रीकृष्ण
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥
हिंदी अर्थतू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
रोमन में पढ़ें
niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ
śharīra-yātrāpi cha te na prasiddhyed akarmaṇaḥ
4
बिना बोझ के कर्म
आसक्ति के बिना, कर्तव्य समझकर कर्म करने वाला ऊँचा उठता है।
हिंदी अर्थइसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।