जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · काम और मेहनत

“क्या ज़्यादा पैसा कमाने की चाह रखना गलत है?”

गीता का छोटा जवाब

गीता धन को बुरा नहीं कहती। वह अन्याय से धन जोड़ने और सिर्फ़ अपने लिए रखने को गलत कहती है — कमाई धर्म से हो, बाँटकर उपयोग हो, और कामना मन की मालिक न बने।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. अन्याय से जोड़ा धन

    कामना के सैकड़ों फंदों में बंधे लोग भोग के लिए अन्याय से धन जोड़ते हैं — गीता इसे आसुरी स्वभाव कहती है।

    गीता 16.11 श्रीकृष्ण

    चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
    कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥

    हिंदी अर्थवे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' -- ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं।

    रोमन में पढ़ें

    chintām aparimeyāṁ cha pralayāntām upāśhritāḥ
    kāmopabhoga-paramā etāvad iti niśhchitāḥ

    अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
    गीता 16.12 श्रीकृष्ण

    आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
    ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥

    हिंदी अर्थवे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।

    रोमन में पढ़ें

    āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ
    īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān

    अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
  2. बाँटकर खाना

    जो यज्ञ से बचा हुआ खाते हैं वे पापों से छूटते हैं; जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।

    गीता 3.13 श्रीकृष्ण

    यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
    भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

    हिंदी अर्थयज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं।

    रोमन में पढ़ें

    yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ
    bhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pachantyātma-kāraṇāt

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  3. सही दान

    कर्तव्य समझकर, सही समय, सही जगह, सही व्यक्ति को, बिना बदले की आशा के दिया दान सात्त्विक है।

    गीता 17.20 श्रीकृष्ण

    दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
    देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥

    हिंदी अर्थदान देना कर्तव्य है -- ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

    रोमन में पढ़ें

    dātavyam iti yad dānaṁ dīyate ‘nupakāriṇe
    deśhe kāle cha pātre cha tad dānaṁ sāttvikaṁ smṛitam

    अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
  4. कामना मालिक न बने

    जैसे नदियाँ समुद्र में समा जाती हैं पर वह मर्यादा नहीं छोड़ता — वैसे ही कामनाएँ आएँ, पर मन अपनी जगह रहे। वही शांति पाता है।

    गीता 2.70 श्रीकृष्ण

    आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
    समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
    तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
    स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

    हिंदी अर्थजैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंकी कामनावाला नहीं।

    रोमन में पढ़ें

    āpūryamāṇam achala-pratiṣhṭhaṁ
    samudram āpaḥ praviśhanti yadvat
    tadvat kāmā yaṁ praviśhanti sarve
    sa śhāntim āpnoti na kāma-kāmī

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि गरीबी ही पुण्य है या कमाना छोड़ दो। वह कमाई के तरीके और उपयोग की बात करती है।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।