“अगर सब भगवान की मर्ज़ी से होता है, तो मेरी गलती की सज़ा मुझे क्यों?”
गीता का छोटा जवाब
गीता कहती है कि भगवान आपके कर्मों के कर्ता नहीं बनते — कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं और “मैंने किया” का भाव हमारा होता है। आपके पास चुनने की बुद्धि है; इसीलिए कृष्ण ने सब समझाकर अर्जुन से कहा — “अब जैसा चाहो, वैसा करो।”
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
भगवान कर्तापन नहीं रचते
भगवान न कर्तापन रचते हैं, न कर्म, न कर्मफल का संयोग — यह सब स्वभाव से चलता है। वे किसी का पाप-पुण्य भी नहीं लेते।
गीता 5.14श्रीकृष्ण
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥
हिंदी अर्थपरमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी, न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।
रोमन में पढ़ें
na kartṛitvaṁ na karmāṇi lokasya sṛijati prabhuḥ
na karma-phala-saṅyogaṁ svabhāvas tu pravartate
हिंदी अर्थसर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं।
रोमन में पढ़ें
nādatte kasyachit pāpaṁ na chaiva sukṛitaṁ vibhuḥ
ajñānenāvṛitaṁ jñānaṁ tena muhyanti jantavaḥ
2
“मैं करता हूँ” — यह भाव हमारा है
सारे कर्म प्रकृति के गुणों से होते हैं, पर अहंकार से मोहित मनुष्य खुद को कर्ता मान लेता है। जिस कर्म को हम अपना मानते हैं, उसकी ज़िम्मेदारी भी हमारी बनती है।
हिंदी अर्थसम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।