जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · कर्म और भाग्य

“बेईमान लोग मज़े में क्यों हैं और ईमानदार परेशान?”

गीता का छोटा जवाब

गीता बाहर दिखने वाले सुख को असली पैमाना नहीं मानती। जो सुख शुरू में अमृत जैसा और अंत में ज़हर जैसा हो, उसे वह राजस कहती है; और अन्याय से धन जोड़ने वालों की अंतहीन चिंता का सच भी बताती है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. दिखने वाला सुख और असली सुख

    सात्त्विक सुख शुरू में ज़हर जैसा लगता है पर अंत में अमृत बनता है; राजस सुख शुरू में अमृत, अंत में ज़हर। जो आज मज़े में दिखता है, वह कहानी का अंत नहीं है।

    गीता 18.37 श्रीकृष्ण

    यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
    तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥

    हिंदी अर्थहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

    रोमन में पढ़ें

    yat tad agre viṣam iva pariṇāme 'mṛtopamam tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
    गीता 18.38 श्रीकृष्ण

    विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
    परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥

    हिंदी अर्थजो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।

    रोमन में पढ़ें

    viṣhayendriya-sanyogād yat tad agre ’mṛitopamam
    pariṇāme viṣham iva tat sukhaṁ rājasaṁ smṛitam

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  2. भीतर की बेचैनी दिखती नहीं

    गीता ऐसे लोगों का वर्णन करती है जो मरते दम तक चिंताओं से घिरे रहते हैं, और कामना के सैकड़ों फंदों में बंधकर अन्याय से धन जोड़ते हैं।

    गीता 16.11 श्रीकृष्ण

    चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
    कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥

    हिंदी अर्थवे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहनेवाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' -- ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं।

    रोमन में पढ़ें

    chintām aparimeyāṁ cha pralayāntām upāśhritāḥ
    kāmopabhoga-paramā etāvad iti niśhchitāḥ

    अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
    गीता 16.12 श्रीकृष्ण

    आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
    ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥

    हिंदी अर्थवे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।

    रोमन में पढ़ें

    āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ
    īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān

    अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
  3. ईमानदारी का फल नष्ट नहीं होता

    अच्छे मार्ग पर चलने वाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।

    गीता 6.40 श्रीकृष्ण

    पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
    नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥

    हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
    na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  4. तुलना छोड़कर अपना धर्म निभाइए

    दूसरे के धर्म से अपना धर्म — भले कम गुणों वाला हो — श्रेष्ठ है। उनकी राह देखकर अपनी राह मत छोड़िए।

    गीता 3.35 श्रीकृष्ण

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
    स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

    हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

    रोमन में पढ़ें

    śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
    swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

    अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि बेईमानी करके भी सच्चा सुख पाया जा सकता है, न यह वादा करती है कि ईमानदारी का इनाम इसी हफ़्ते दिखेगा।

यह जवाब अपनों को भेजें

इसी तरह के और सवाल

सभी जीवन के सवाल कर्म, मन, दुख, रिश्ते, भगवान — गीता के जवाब

जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।