“मैंने हमेशा अच्छा किया, फिर भी मेरे साथ ही बुरा क्यों होता है?”
गीता का छोटा जवाब
गीता के अनुसार किसी भी परिणाम के पीछे केवल आपकी अच्छाई नहीं, पाँच कारण होते हैं — और कर्म की गति बहुत गहरी है। पर एक बात पक्की है: आपका किया हुआ अच्छा कभी नष्ट नहीं होता।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
नतीजा सिर्फ़ आपके हाथ में नहीं होता
गीता हर कर्म के पाँच कारण बताती है — स्थान, करने वाला, साधन, अलग-अलग प्रयास, और पाँचवाँ दैव। आपकी अच्छाई इनमें से एक है, पूरे परिणाम की गारंटी नहीं।
गीता 18.14श्रीकृष्ण
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
हिंदी अर्थइसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।
रोमन में पढ़ें
adhiṣhṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ cha pṛithag-vidham
vividhāśh cha pṛithak cheṣhṭā daivaṁ chaivātra pañchamam
गीता 18.15श्रीकृष्ण
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥
हिंदी अर्थमनुष्य, शरीर वाणी और मनके द्वारा शास्त्रविहित अथवा शास्त्रविरुद्ध जो कुछ भी कर्म आरम्भ करता है, उसके ये (पूर्वोक्त) पाँचों हेतु होते हैं।
हिंदी अर्थसर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है; किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है, उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं।
रोमन में पढ़ें
nādatte kasyachit pāpaṁ na chaiva sukṛitaṁ vibhuḥ
ajñānenāvṛitaṁ jñānaṁ tena muhyanti jantavaḥ
गीता 9.29श्रीकृष्ण
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
हिंदी अर्थमैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ।
रोमन में पढ़ें
samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ
ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham
3
कर्म की गति समझना कठिन है
कौन-सा फल कब और क्यों आता है, यह पूरी तरह दिखाई नहीं देता — गीता खुद कहती है कि कर्म की गति गहन है। इसलिए हर दुख का हिसाब ढूँढने में मन मत उलझाइए।
हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati
गीता 2.40श्रीकृष्ण
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।
सुख-दुःख सर्दी-गर्मी की तरह आते-जाते हैं, टिकते नहीं। गीता कहती है — इन्हें धैर्य से सहन करो; यह समय भी बदलेगा।
गीता 2.14श्रीकृष्ण
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो।
रोमन में पढ़ें
mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ
āgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata
✋ गीता यह नहीं कहती
गीता यह नहीं कहती कि आपका दुख आपकी सज़ा है, या भगवान आपसे नाराज़ हैं। न ही यह कहती है कि बुरा होने पर अच्छाई छोड़ दें।