जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · कर्म और भाग्य

“क्या पिछले जन्म के कर्म इस जन्म में भोगने ही पड़ते हैं?”

गीता का छोटा जवाब

गीता मानती है कि कर्म का फल मिलता है और पिछले संस्कार साथ आते हैं। पर वह यह भी कहती है कि ज्ञान और भगवान की शरण से कर्म के बंधन कट जाते हैं — आप केवल भोगने वाले नहीं, आज कर्म करने वाले भी हैं।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. हाँ, कर्म का फल होता है

    कामना से किए कर्मों का फल तीन तरह का होता है — अच्छा, बुरा और मिला-जुला — और वह आगे भी साथ जाता है।

    गीता 18.12 श्रीकृष्ण

    अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
    भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥

    हिंदी अर्थकर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित -- ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है; परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    aniṣhṭam iṣhṭaṁ miśhraṁ cha tri-vidhaṁ karmaṇaḥ phalam
    bhavaty atyāgināṁ pretya na tu sannyāsināṁ kvachit

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  2. संस्कार अगले जीवन तक जाते हैं

    गुणों से जुड़ाव ही अच्छी-बुरी परिस्थितियों में जन्म का कारण बनता है। पर यही नियम अच्छाई पर भी लागू है — पिछले जन्म की साधना भी अगले जन्म में फिर से जाग उठती है।

    गीता 13.21 श्रीकृष्ण

    पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
    कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥

    हिंदी अर्थप्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है।

    रोमन में पढ़ें

    puruṣhaḥ prakṛiti-stho hi bhuṅkte prakṛiti-jān guṇān
    kāraṇaṁ guṇa-saṅgo ’sya sad-asad-yoni-janmasu

    अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
    गीता 6.43 श्रीकृष्ण

    तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
    यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥

    हिंदी अर्थहे कुरुनन्दन ! वहाँपर उसको पूर्वजन्मकृत साधन-सम्पत्ति अनायास ही प्राप्त हो जाती है। फिर उससे वह साधनकी सिद्धिके विषयमें पुनः विशेषतासे यत्न करता है।

    रोमन में पढ़ें

    tatra taṁ buddhi-sanyogaṁ labhate paurva-dehikam
    yatate cha tato bhūyaḥ sansiddhau kuru-nandana

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  3. पर आप बंधे हुए नहीं हैं

    जैसे जलती आग लकड़ियों को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की आग सभी कर्मों को भस्म कर देती है।

    गीता 4.37 श्रीकृष्ण

    यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
    ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥

    हिंदी अर्थहे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको सर्वथा भस्म कर देती है।

    रोमन में पढ़ें

    yathaidhānsi samiddho ’gnir bhasma-sāt kurute ’rjuna
    jñānāgniḥ sarva-karmāṇi bhasma-sāt kurute tathā

    अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
  4. शरण सबसे बड़ा रास्ता है

    बहुत बुरे आचरण वाला भी यदि अनन्य भाव से भगवान को भजे, तो वह जल्दी धर्मात्मा बन जाता है। कृष्ण का वचन है — मेरी शरण आओ, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत करो।

    गीता 9.30 श्रीकृष्ण

    अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
    साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥

    हिंदी अर्थअगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।

    रोमन में पढ़ें

    api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk
    sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
    गीता 9.31 श्रीकृष्ण

    क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
    कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

    हिंदी अर्थवह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati
    kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
    गीता 18.66 श्रीकृष्ण

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

    हिंदी अर्थसम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।

    रोमन में पढ़ें

    sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja
    ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  5. आज का कर्म आपके हाथ में है

    अपने-आप को अपने ही द्वारा ऊपर उठाओ, नीचे मत गिराओ। पिछला बदल नहीं सकता, पर आज का कर्म आपकी आने वाली कहानी लिखता है।

    गीता 6.5 श्रीकृष्ण

    उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

    हिंदी अर्थअपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।

    रोमन में पढ़ें

    uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet
    ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि हर दुख के पीछे कोई पुराना पाप ढूँढो, या जो हो रहा है वह बदला नहीं जा सकता। किसी दुखी व्यक्ति से “यह तुम्हारे कर्मों का फल है” कहना गीता की करुणा के विरुद्ध है।

यह जवाब अपनों को भेजें

इसी तरह के और सवाल

सभी जीवन के सवाल कर्म, मन, दुख, रिश्ते, भगवान — गीता के जवाब

जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।