जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · जीवन और मृत्यु

“रोज़ वही काम, वही ज़िंदगी — आख़िर हम जी किसलिए रहे हैं?”

गीता का छोटा जवाब

गीता कहती है कि आप भगवान के सनातन अंश हैं — जीवन का असली अर्थ उस संबंध को पहचानना है। रोज़ का वही काम भी, भगवान को अर्पण करके किया जाए तो पूजा बन जाता है और सिद्धि तक ले जाता है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. आप कौन हैं

    इस संसार में जीव मेरा ही सनातन अंश है।

    गीता 15.7 श्रीकृष्ण

    ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
    मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

    हिंदी अर्थइस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

    रोमन में पढ़ें

    mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ
    manaḥ-ṣhaṣhṭhānīndriyāṇi prakṛiti-sthāni karṣhati

    अध्याय 15 · पुरुषोत्तमयोग
  2. रोज़ का काम ही पूजा

    अपने स्वाभाविक कर्म से भगवान की पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

    गीता 18.46 श्रीकृष्ण

    यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
    स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

    हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam
    sva-karmaṇā tam abhyarchya siddhiṁ vindati mānavaḥ

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  3. कर्म किसके लिए

    यज्ञ (भगवान और सबके हित) के लिए किया कर्म बाँधता नहीं; केवल अपने लिए किया कर्म बंधन बनता है।

    गीता 3.9 श्रीकृष्ण

    यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
    तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥

    हिंदी अर्थयज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये हे कुन्तीनन्दन ! तू आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्य-कर्म कर।

    रोमन में पढ़ें

    yajñārthāt karmaṇo ’nyatra loko ’yaṁ karma-bandhanaḥ
    tad-arthaṁ karma kaunteya mukta-saṅgaḥ samāchara

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  4. भीतर का संतोष

    जो आत्मा में ही रमता है, उसी में तृप्त और संतुष्ट है — उसके लिए कोई कमी नहीं रहती।

    गीता 3.17 श्रीकृष्ण

    यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
    आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥

    हिंदी अर्थजो मनुष्य अपने-आपमें ही रमण करनेवाला और अपने-आपमें ही तृप्त तथा अपने-आपमें ही संतुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।

    रोमन में पढ़ें

    yas tvātma-ratir eva syād ātma-tṛiptaśh cha mānavaḥ
    ātmanyeva cha santuṣhṭas tasya kāryaṁ na vidyate

    अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि साधारण जीवन बेकार है और कुछ बड़ा करने के लिए सब छोड़ना होगा।

यह जवाब अपनों को भेजें

इसी तरह के और सवाल

सभी जीवन के सवाल कर्म, मन, दुख, रिश्ते, भगवान — गीता के जवाब

जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।