जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · जीवन और मृत्यु

“बुढ़ापे में बच्चे पास नहीं रहते, बहुत अकेला लगता है — क्या करूँ?”

गीता का छोटा जवाब

गीता कहती है कि बुढ़ापा बचपन और जवानी जैसा ही जीवन का एक पड़ाव है। और आप कभी पूरी तरह अकेले नहीं — ईश्वर हर प्राणी के हृदय में रहते हैं। प्रेम बना रहे, बस पकड़ थोड़ी ढीली हो, और समय भगवान से जुड़ने में लगे।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. यह भी जीवन का एक पड़ाव है

    जैसे इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आते हैं — धीर मनुष्य इनसे मोहित नहीं होता। बुढ़ापा हार नहीं, एक और अवस्था है।

    गीता 2.13 श्रीकृष्ण

    देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
    तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

    हिंदी अर्थदेहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā
    tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  2. आप अकेले नहीं हैं

    ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहते हैं। जो सबमें उन्हें देखता है, उसके लिए भगवान कभी ओझल नहीं होते, और वह उनके लिए कभी ओझल नहीं होता।

    गीता 18.61 श्रीकृष्ण

    ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
    भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

    हिंदी अर्थहे अर्जुन ! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।

    रोमन में पढ़ें

    īśhvaraḥ sarva-bhūtānāṁ hṛid-deśhe ‘rjuna tiṣhṭhati
    bhrāmayan sarva-bhūtāni yantrārūḍhāni māyayā

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
    गीता 6.30 श्रीकृष्ण

    यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
    तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥

    हिंदी अर्थजो सबमें मुझे देखता है और सबको मुझमें देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    yo māṁ paśhyati sarvatra sarvaṁ cha mayi paśhyati
    tasyāhaṁ na praṇaśhyāmi sa cha me na praṇaśhyati

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  3. प्रेम रहे, पकड़ ढीली हो

    गीता ज्ञान के लक्षणों में बताती है — पुत्र, स्त्री, घर में “एकात्मता” यानी ऐसी पकड़ न हो कि उनके बिना जीना भारी लगे। बच्चों से प्रेम रखिए, पर अपनी ख़ुशी पूरी तरह उनके आने-जाने पर मत टिकाइए।

    गीता 13.9 श्रीकृष्ण

    असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
    नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥

    हिंदी अर्थआसक्तिरहित होना;  पुत्र,  स्त्री, घर आदिमें एकात्मता (घनिष्ठ सम्बन्ध) न होना और अनुकूलता-प्रतिकूलताकी प्राप्तिमें चित्तका नित्य सम रहना।

    रोमन में पढ़ें

    asaktir anabhiṣhvaṅgaḥ putra-dāra-gṛihādiṣhu
    nityaṁ cha sama-chittatvam iṣhṭāniṣhṭopapattiṣhu

    अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
  4. भक्ति के लिए कुछ बड़ा नहीं चाहिए

    एक पत्ता, एक फूल, थोड़ा जल — प्रेम से अर्पण करो, भगवान स्वीकार करते हैं। यह समय भगवान से जुड़ने का सबसे अच्छा समय बन सकता है।

    गीता 9.26 श्रीकृष्ण

    पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
    तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

    हिंदी अर्थजो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ।

    रोमन में पढ़ें

    patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati
    tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि बच्चों की उपेक्षा चुपचाप सहो। उनसे अपने मन की बात कहें, और आस-पास के लोगों, सत्संग या बुज़ुर्गों के समूह से जुड़ें।

यह जवाब अपनों को भेजें

इसी तरह के और सवाल

सभी जीवन के सवाल कर्म, मन, दुख, रिश्ते, भगवान — गीता के जवाब

जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।