जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · जीवन और मृत्यु

“मरने के बाद क्या होता है?”

गीता का छोटा जवाब

गीता कहती है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है — शरीर बदलता है, जैसे हम पुराने कपड़े बदलते हैं। अंत समय मन जिस भाव में होता है, वही आगे की यात्रा तय करता है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. आत्मा मरती नहीं

    आत्मा किसी काल में न जन्म लेती है, न मरती है; शरीर मारे जाने पर भी वह नहीं मरती।

    गीता 2.20 श्रीकृष्ण

    न जायते म्रियते वा कदाचि
    न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
    अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
    न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

    हिंदी अर्थयह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।

    रोमन में पढ़ें

    na jāyate mriyate vā kadāchin
    nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ
    ajo nityaḥ śhāśhvato ’yaṁ purāṇo
    na hanyate hanyamāne śharīre

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  2. पुराने कपड़े, नए कपड़े

    जैसे मनुष्य पुराने कपड़े छोड़कर नए पहन लेता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर में जाती है।

    गीता 2.22 श्रीकृष्ण

    वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
    नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
    तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
    न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

    हिंदी अर्थमनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है, ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    vāsānsi jīrṇāni yathā vihāya
    navāni gṛihṇāti naro ’parāṇi
    tathā śharīrāṇi vihāya jīrṇānya
    nyāni sanyāti navāni dehī

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  3. संस्कार साथ जाते हैं

    जैसे हवा फूलों से सुगंध ले जाती है, वैसे ही जीव मन और इंद्रियों के संस्कार साथ लेकर जाता है।

    गीता 15.8 श्रीकृष्ण

    शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
    गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥

    हिंदी अर्थजैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    śharīraṁ yad avāpnoti yach chāpy utkrāmatīśhvaraḥ
    gṛihītvaitāni sanyāti vāyur gandhān ivāśhayāt

    अध्याय 15 · पुरुषोत्तमयोग
  4. अंत का भाव

    अंत समय जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छूटता है, उसी को वह प्राप्त होता है — और जो भगवान को याद करता है, वह उन्हें पाता है।

    गीता 8.5 श्रीकृष्ण

    अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
    यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥

    हिंदी अर्थजो मनुष्य अन्तकालमें भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरुप को ही प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं है।

    रोमन में पढ़ें

    anta-kāle cha mām eva smaran muktvā kalevaram
    yaḥ prayāti sa mad-bhāvaṁ yāti nāstyatra sanśhayaḥ

    अध्याय 8 · अक्षरब्रह्मयोग
    गीता 8.6 श्रीकृष्ण

    यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
    तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥

    हिंदी अर्थहे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ tyajatyante kalevaram
    taṁ tam evaiti kaunteya sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ

    अध्याय 8 · अक्षरब्रह्मयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह सब मृत्यु का डर दिखाने के लिए नहीं, मृत्यु का डर मिटाने के लिए कहती है। स्वर्ग-नरक के डरावने चित्र उसके केंद्र में नहीं हैं।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।