गीता कहती है कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है — शरीर बदलता है, जैसे हम पुराने कपड़े बदलते हैं। अंत समय मन जिस भाव में होता है, वही आगे की यात्रा तय करता है।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
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आत्मा मरती नहीं
आत्मा किसी काल में न जन्म लेती है, न मरती है; शरीर मारे जाने पर भी वह नहीं मरती।
गीता 2.20श्रीकृष्ण
न जायते म्रियते वा कदाचि
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
हिंदी अर्थयह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित, नित्य-निरन्तर रहनेवाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।
रोमन में पढ़ें
na jāyate mriyate vā kadāchin
nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ
ajo nityaḥ śhāśhvato ’yaṁ purāṇo
na hanyate hanyamāne śharīre
2
पुराने कपड़े, नए कपड़े
जैसे मनुष्य पुराने कपड़े छोड़कर नए पहन लेता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर में जाती है।
हिंदी अर्थजैसे वायु गन्धके स्थानसे गन्धको ग्रहण करके ले जाती है, ऐसे ही शरीरादिका स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीरको छोड़ता है, वहाँसे मनसहित इन्द्रियोंको ग्रहण करके फिर जिस शरीरको प्राप्त होता है, उसमें चला जाता है।
हिंदी अर्थहे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भावका स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है वह उस (अन्तकालके) भावसे सदा भावित होता हुआ उस-उसको ही प्राप्त होता है अर्थात् उस-उस योनिमें ही चला जाता है।