जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · जीवन और मृत्यु

“कोई अपना हमेशा के लिए चला गया — यह दर्द कैसे सहूँ?”

गीता का छोटा जवाब

गीता का पहला उपदेश ही शोक पर है। कृष्ण कहते हैं कि जो सच में है — आत्मा — वह कभी नष्ट नहीं होती; बदलता सिर्फ़ शरीर है। दर्द सच्चा है, पर जो गया वह मिटा नहीं।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. आँसू स्वाभाविक हैं

    अर्जुन की आँखें भी आँसुओं से भरी थीं, और कृष्ण ने उसी हालत से बात शुरू की।

    गीता 2.1 संजय

    तं तथा कृपयाऽविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
    विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥

    हिंदी अर्थवैसी कायरता से आविष्ट उन अर्जुन के प्रति, जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओं के कारण जिनके नेत्रों की देखने की शक्ति अवरुद्ध हो रही है, भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।

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    sañjaya uvācha
    taṁ tathā kṛipayāviṣhṭamaśhru pūrṇākulekṣhaṇam
    viṣhīdantamidaṁ vākyam uvācha madhusūdanaḥ

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  2. जो है, वह मिटता नहीं

    ज्ञानी न गए हुए का शोक करते हैं, न रहने वालों का — क्योंकि कोई भी सच में समाप्त नहीं होता।

    गीता 2.11 श्रीकृष्ण

    अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
    गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥

    हिंदी अर्थतुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और  पण्डिताईकी बातें कह रहे हो; परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिये पण्डितलोग शोक नहीं करते।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    aśhochyān-anvaśhochas-tvaṁ prajñā-vādānśh cha bhāṣhase
    gatāsūn-agatāsūnśh-cha nānuśhochanti paṇḍitāḥ

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
    गीता 2.12 श्रीकृष्ण

    न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
    न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥

    हिंदी अर्थकिसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे, यह बात भी नहीं है; और इसके बाद (भविष्य में) मैं, तू और राजलोग - हम सभी नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं है।

    रोमन में पढ़ें

    na tvevāhaṁ jātu nāsaṁ na tvaṁ neme janādhipāḥ
    na chaiva na bhaviṣhyāmaḥ sarve vayamataḥ param

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  3. शरीर की यात्रा

    जैसे इस शरीर में बचपन, जवानी, बुढ़ापा आते हैं, वैसे ही दूसरा शरीर मिलना भी यात्रा का हिस्सा है।

    गीता 2.13 श्रीकृष्ण

    देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
    तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

    हिंदी अर्थदेहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā
    tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  4. जो जन्मा, वह जाएगा

    जन्मे की मृत्यु और मरे का जन्म निश्चित है — इस अटल बात पर शोक करना उचित नहीं।

    गीता 2.27 श्रीकृष्ण

    जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
    तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥

    हिंदी अर्थक्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।

    रोमन में पढ़ें

    jātasya hi dhruvo mṛityur dhruvaṁ janma mṛitasya cha
    tasmād aparihārye ’rthe na tvaṁ śhochitum arhasi

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  5. अदृश्य से अदृश्य तक

    प्राणी जन्म से पहले अदृश्य थे, मृत्यु के बाद भी अदृश्य — बीच में ही दिखते हैं; तो इसमें शोक कैसा?

    गीता 2.28 श्रीकृष्ण

    अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
    अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥

    हिंदी अर्थहे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है?

    रोमन में पढ़ें

    avyaktādīni bhūtāni vyakta-madhyāni bhārata
    avyakta-nidhanānyeva tatra kā paridevanā

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि रोना कमज़ोरी है या जल्दी भूल जाओ। वह दर्द को समझ के साथ उठाना सिखाती है। शोक बहुत भारी लगे तो अपनों से बात करें और मदद लें।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।