अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #36 · आस्था सब कुछ बनाम कुछ कमी

नौकरी, घर, परिवार — सब ठीक है, फिर भी भीतर एक खालीपन है। आप क्या करेंगे?

बाहर से देखने वालों को लगता है, आपके पास सब कुछ है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता कहती है कि असली संतोष भीतर है — जीव परमात्मा का ही सनातन अंश है (15.7), और अपने-आप में संतुष्ट होना स्थिर बुद्धि का लक्षण है (2.55)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. और ज़्यादा कमाऊँगा, पाऊँगा — गीता कहती है कामनाएँ समुद्र में गिरती नदियों जैसी हैं — शांति उसे मिलती है जो उनसे विचलित न हो, कामना करने वाले को नहीं (2.70)।

B. सब छोड़कर संन्यास की ओर — गीता केवल बाहरी संन्यास को पूरा नहीं मानती — कर्मफल का आश्रय छोड़कर कर्तव्य करने वाला ही संन्यासी है (6.1)।

C. काम करते हुए भीतर की ओर ध्यान दूँगा — यह गीता के करीब है — जो अपने-आप में संतुष्ट है (2.55, 3.17) और भीतर का सुख पाता है (5.21), उसे बाहर की कमी नहीं खलती।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 2.70 श्रीकृष्ण

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

हिंदी अर्थजैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंकी कामनावाला नहीं।

रोमन में पढ़ें

āpūryamāṇam achala-pratiṣhṭhaṁ
samudram āpaḥ praviśhanti yadvat
tadvat kāmā yaṁ praviśhanti sarve
sa śhāntim āpnoti na kāma-kāmī

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.55 श्रीकृष्ण

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha mano-gatān
ātmany-evātmanā tuṣhṭaḥ sthita-prajñas tadochyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 3.17 श्रीकृष्ण

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥

हिंदी अर्थजो मनुष्य अपने-आपमें ही रमण करनेवाला और अपने-आपमें ही तृप्त तथा अपने-आपमें ही संतुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।

रोमन में पढ़ें

yas tvātma-ratir eva syād ātma-tṛiptaśh cha mānavaḥ
ātmanyeva cha santuṣhṭas tasya kāryaṁ na vidyate

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 5.21 श्रीकृष्ण

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥

हिंदी अर्थबाह्यस्पर्शमें आसक्तिरहित अन्तःकरणवाला साधक आत्मामें जो सुख है, उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित मनुष्य अक्षय सुखका अनुभव करता है।

रोमन में पढ़ें

bāhya-sparśheṣhvasaktātmā vindatyātmani yat sukham
sa brahma-yoga-yuktātmā sukham akṣhayam aśhnute

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 6.1 श्रीकृष्ण

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥

हिंदी अर्थकर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ
sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 15.7 श्रीकृष्ण

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

हिंदी अर्थइस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

रोमन में पढ़ें

mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ
manaḥ-ṣhaṣhṭhānīndriyāṇi prakṛiti-sthāni karṣhati

अध्याय 15 · पुरुषोत्तमयोग

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