परिवार की रक्षा, दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए उपकारी
रोहन
जय सावित्री माता!
वट सावित्री व्रत विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु की कामना से रखा जाता है। यह व्रत सावित्री और सत्यवान की अमर प्रेम-कथा पर आधारित है, जिसमें सावित्री ने अपनी बुद्धि और पतिव्रता धर्म से यमराज से अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए थे।
व्रत के नियम
इस दिन स्त्रियाँ वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करती हैं, उसके तने पर कच्चा सूत लपेटकर परिक्रमा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। सोलह श्रृंगार कर सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है तथा दिन भर उपवास रखा जाता है।
कथा
राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने स्वयंवर में सत्यवान नामक तेजस्वी परन्तु निर्धन राजकुमार को अपना पति चुना, यद्यपि उसे ज्ञात था कि सत्यवान की आयु केवल एक वर्ष शेष है। विवाह के पश्चात सावित्री पूर्ण श्रद्धा और सेवाभाव से अपने पति और सास-ससुर की सेवा करने लगी।
जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, सावित्री भी उसके साथ वन गई। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री दृढ़ता से उनके पीछे-पीछे चलती रही। उसकी पतिव्रता निष्ठा और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न होकर यमराज ने उसे कई वरदान दिए, परन्तु सावित्री ने चतुराई से सत्यवान के प्राण ही माँग लिए।
अंततः यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े। जिस वट वृक्ष के नीचे सत्यवान के प्राण लौटे, उसी की स्मृति में वट वृक्ष की पूजा की परंपरा आरम्भ हुई।
व्रत के लाभ
वट सावित्री व्रत करने से पति की आयु लंबी होती है, दांपत्य जीवन में प्रेम और विश्वास बना रहता है तथा घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
जय सावित्री माता!