संतान की लंबी उम्र और माता की सुरक्षा के लिए शुभ व्रत कथा
रोहन
जय जीमूतवाहन देव!
जीवितपुत्रिका (जितिया) व्रत माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु और सुरक्षा की कामना से रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाता है।
व्रत के नियम
यह व्रत निर्जला रखा जाता है और तीन दिनों में सम्पन्न होता है — पहले दिन नहाय-खाय, दूसरे दिन पूर्ण निर्जल उपवास और तीसरे दिन पारण। माताएँ जीमूतवाहन देव और चील-सियारिन की कथा सुनती हैं तथा संतान की दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं।
कथा
प्राचीन काल में जीमूतवाहन नामक एक दयालु राजकुमार था, जिसने नागों की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति देने का संकल्प लिया था। उसकी करुणा और त्याग से प्रसन्न होकर देवताओं ने उसे अमरता का आशीर्वाद दिया।
इसी कथा से जुड़ी एक अन्य कथा में एक चील और एक सियारिन एक वृक्ष पर जीमूतवाहन का व्रत विधि देख रही थीं। चील ने सच्चे मन से व्रत का पालन किया, जबकि सियारिन ने छिपकर मांस खा लिया और व्रत भंग कर दिया। परिणामस्वरूप अगले जन्म में चील मनुष्य योनि में उच्च कुल में जन्मी और उसकी संतानें दीर्घायु हुईं, जबकि सियारिन की संतानें अल्पायु में ही चल बसीं।
यह देखकर सियारिन को अपनी भूल का बोध हुआ और उसने अगले जन्म में सच्चे मन से जीवितपुत्रिका व्रत रखने का संकल्प लिया। तभी से यह व्रत संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए किया जाने लगा।
व्रत के लाभ
जीवितपुत्रिका व्रत करने से संतान की आयु लंबी होती है, उनकी रक्षा होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
जय जीमूतवाहन देव!