सत्यनारायण कथा

संकट निवारण, समृद्धि और परिवार की खुशहाली के लिए

व्रत कथा · 10 बार पढ़ा गया

अध्याय 1

तदनन्तर सूत जी बोले— हे शौनकादि ऋषियो! एक समय देवर्षि नारद भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि नाना प्रकार के कर्मों के कारण मनुष्य दुःख और संताप में डूबे हुए हैं। यह देखकर नारद जी के मन में करुणा उत्पन्न हुई और वे मनुष्यों के दुःख निवारण का सरल उपाय जानने के लिए भगवान विष्णु के धाम वैकुण्ठ पहुँचे। नारद जी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, "हे प्रभु! कलियुग में मनुष्य अल्प साधनों में ही अपने समस्त कष्टों से किस प्रकार मुक्त हो सकते हैं? कृपया मुझे कोई ऐसा सरल व्रत बताइए, जिससे मनुष्य सुख, समृद्धि और मोक्ष प्राप्त कर सके।" भगवान विष्णु मुस्कुराए और बोले, "हे नारद! एक व्रत है, जिसका नाम है श्री सत्यनारायण व्रत। जो मनुष्य श्रद्धा-भक्ति से इस व्रत को करता है और इसकी कथा सुनता है, उसके सभी संकट दूर होकर उसे इस लोक में सुख-समृद्धि तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत किसी भी दिन, विशेषकर पूर्णिमा अथवा संकष्टी के दिन, सायंकाल श्रद्धापूर्वक परिवार और मित्रों को साथ लेकर करना चाहिए।" तब भगवान विष्णु ने नारद जी को इस व्रत की विधि बताते हुए एक प्राचीन कथा सुनाई। उन्होंने कहा, "प्राचीन काल में एक अत्यंत निर्धन वृद्ध ब्राह्मण था। वह प्रतिदिन भिक्षा मांगकर किसी प्रकार अपना और परिवार का पेट पालता था। एक दिन भिक्षाटन करते-करते थककर वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गया और अपनी दीन दशा पर विलाप करने लगा। उसी समय मैं वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उसके समीप गया और उसकी व्यथा का कारण पूछा।" "उस निर्धन ब्राह्मण ने अपनी सारी विपत्ति कह सुनाई। तब मैंने उसे सत्यनारायण व्रत करने की विधि बताई और कहा कि श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करने से उसके सभी दुःख दूर हो जाएंगे। ब्राह्मण ने अगले ही दिन जो कुछ भिक्षा में प्राप्त हुआ, उसी से यथाशक्ति सत्यनारायण भगवान की पूजा की, कथा सुनी और प्रसाद ग्रहण किया। मेरी कृपा से उसकी दरिद्रता शीघ्र ही दूर हो गई और वह सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।" नारद जी यह प्रथम कथा सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए और भगवान को प्रणाम कर मृत्युलोक में इस व्रत का प्रचार करने चले गए।

अध्याय 2

सूत जी बोले— हे ऋषियो! अब मैं आपको सत्यनारायण व्रत की दूसरी कथा सुनाता हूँ। प्राचीन काल में काशी नगरी में एक अत्यंत निर्धन लकड़हारा रहता था। वह प्रतिदिन वन से लकड़ी काटकर लाता और नगर में बेचकर अपनी जीविका चलाता था। एक दिन वह लकड़ी का भार सिर पर लिए नगर में जा रहा था। मार्ग में उसने देखा कि कुछ ब्राह्मण एक वृक्ष के नीचे बैठकर श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा-श्रवण कर रहे हैं। लकड़हारे के मन में जिज्ञासा हुई और उसने पास जाकर पूछा, "हे विप्रवरो! आप यह कौन-सी पूजा कर रहे हैं?" ब्राह्मणों ने उसे बताया कि यह भगवान सत्यनारायण का व्रत है, जिसे करने से मनुष्य के सभी दुःख-दारिद्र्य दूर हो जाते हैं। यह सुनकर लकड़हारे के मन में भी यह व्रत करने की इच्छा जागृत हुई। उसने मन ही मन संकल्प लिया, "यदि आज लकड़ी बेचकर अच्छा मूल्य प्राप्त हुआ, तो मैं भी भगवान सत्यनारायण की पूजा करूंगा।" उस दिन संयोगवश उसकी लकड़ी सामान्य से कहीं अधिक मूल्य पर बिकी। लकड़हारे ने अपने संकल्प का स्मरण कर उसी सायं यथाशक्ति सत्यनारायण भगवान की पूजा का आयोजन किया, कथा सुनी और प्रसाद बांटा। भगवान की कृपा से उसके दुःख धीरे-धीरे दूर होने लगे और वह क्रमशः समृद्धिशाली व्यापारी बन गया। इस प्रकार निर्धन लकड़हारे ने भी श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करने से सुख-समृद्धि प्राप्त की। इससे यह सिद्ध होता है कि सत्यनारायण व्रत निर्धन से निर्धन व्यक्ति के लिए भी सुलभ और फलदायी है, बस श्रद्धा और सच्चा संकल्प होना चाहिए।

अध्याय 3

सूत जी बोले— अब मैं तीसरी कथा सुनाता हूँ। एक नगर में साधु नामक एक वैश्य रहता था। वह बड़ा धनी और उदार था, परन्तु उसे कोई संतान न थी, जिस कारण वह और उसकी पत्नी लीलावती सदैव चिंतित रहते थे। एक दिन साधु वैश्य ने नदी तट पर राजा उल्कामुख को श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण भगवान की पूजा करते देखा। उसने पूजा का महत्व जाना और मन ही मन संकल्प लिया कि यदि उसे संतान की प्राप्ति हुई, तो वह भी यह व्रत अवश्य करेगा। भगवान की कृपा से शीघ्र ही साधु वैश्य के घर एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। परन्तु सांसारिक व्यस्तताओं में साधु वैश्य अपना संकल्प भूल गया और व्रत करना टालता रहा। समय बीतता गया, कलावती विवाह योग्य हुई और उसका विवाह भी हो गया, फिर भी साधु वैश्य ने वह व्रत पूर्ण न किया। एक बार साधु वैश्य अपने जामाता के साथ व्यापार हेतु परदेश जा रहा था। मार्ग में एक नगर में उसने फिर एक स्थान पर सत्यनारायण पूजा होते देखी, परन्तु अहंकारवश और जल्दबाजी में उसने पूजा में सम्मिलित होकर भी विधिपूर्वक व्रत पूर्ण नहीं किया। इस उपेक्षा के फलस्वरूप आगे की यात्रा में उसे और उसके जामाता को भारी कष्टों का सामना करना पड़ा - वे मिथ्या दोष में राजा द्वारा बंदी बना लिए गए और उनका सारा धन-संपत्ति जब्त हो गई। इधर घर पर लीलावती और कलावती ने भी एक बार सत्यनारायण भगवान का प्रसाद अनादरपूर्वक ग्रहण कर लिया, जिससे उन्हें भी विपत्तियों का सामना करना पड़ा। जब कलावती को अपनी भूल का बोध हुआ, तो उसने सच्चे मन से भगवान से क्षमा मांगी और विधिपूर्वक सत्यनारायण व्रत करने का संकल्प लिया। माता लीलावती के साथ मिलकर उसने श्रद्धा और नियमपूर्वक यह व्रत सम्पन्न किया। भगवान सत्यनारायण की कृपा से उसी क्षण साधु वैश्य और उसके जामाता बंधनों से मुक्त हो गए, उनका खोया हुआ धन पुनः प्राप्त हुआ और वे सकुशल घर लौट आए। परिवार में पुनः सुख-समृद्धि छा गई। साधु वैश्य ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए तत्पश्चात प्रतिवर्ष विधिपूर्वक सत्यनारायण व्रत करने का नियम बना लिया। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि सत्यनारायण व्रत का संकल्प लेकर उसे विस्मृत करना या अनादर करना दुःखदायी होता है, जबकि श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पालन करने से सभी संकट दूर होकर सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

अध्याय 4

सूत जी बोले— अब मैं चौथी कथा सुनाता हूँ। प्राचीन काल में तुंगध्वज नामक एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा प्रतापी था, परन्तु स्वभाव से कुछ अहंकारी भी था। एक दिन वह वन में शिकार खेलने गया। मार्ग में उसने देखा कि कुछ ग्वाल-बाल एक वृक्ष के नीचे श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण भगवान की पूजा कर रहे हैं और सबको प्रसाद बांट रहे हैं। बालकों ने राजा को भी आदरपूर्वक प्रसाद ग्रहण करने का निवेदन किया, परंतु अहंकारवश राजा ने यह कहकर प्रसाद ठुकरा दिया कि एक राजा साधारण ग्वालों द्वारा दी गई भेंट स्वीकार नहीं कर सकता। उसने भगवान की पूजा और प्रसाद का अनादर करते हुए अपना मार्ग पकड़ लिया। इस अनादर का फल राजा को शीघ्र ही भुगतना पड़ा। कुछ ही दिनों में उसके राज्य पर एक के बाद एक विपत्तियां आने लगीं - उसके पुत्रों की मृत्यु हो गई, राजकोष रिक्त हो गया और शत्रुओं ने राज्य पर आक्रमण कर दिया। राजा तुंगध्वज समझ न सका कि यह सब क्यों हो रहा है। अंततः एक विद्वान मंत्री ने राजा को स्मरण कराया कि उसने ग्वाल-बालों द्वारा अर्पित सत्यनारायण भगवान के प्रसाद का अनादर किया था, यही उसके संकट का मूल कारण है। यह सुनकर राजा को अपनी भूल का बोध हुआ। उसने तत्काल उन्हीं ग्वाल-बालों के पास जाकर क्षमा मांगी और विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान की पूजा कर श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया। भगवान की कृपा से राजा तुंगध्वज का खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ, शत्रु पराजित हुए और राज्य में पुनः सुख-समृद्धि लौट आई। तभी से राजा प्रतिवर्ष श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण व्रत करने लगा और अपनी प्रजा को भी इसकी महिमा बताने लगा। इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि भगवान का प्रसाद चाहे जिस किसी के द्वारा भी अर्पित किया जाए, उसका अनादर नहीं करना चाहिए; उसे सदैव श्रद्धा और विनम्रता से ग्रहण करना चाहिए।

अध्याय 5

सूत जी बोले— हे शौनकादि मुनिगण! इस प्रकार भगवान सत्यनारायण की कथाएं सुनकर देवर्षि नारद तथा राजा उल्कामुख आदि सभी ने पृथ्वीलोक में इस व्रत का प्रचार किया। तभी से मनुष्य विवाह, उपनयन, गृहप्रवेश, संतान-जन्म अथवा किसी भी शुभ कार्य के अवसर पर, अथवा पूर्णिमा और संकष्टी के दिन श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा का आयोजन करने लगे। भगवान सत्यनारायण की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जो मनुष्य श्रद्धा-भक्ति से इस व्रत को करता है, पूजा में केले, दूध, घी, गेहूं के आटे अथवा सूजी और शक्कर से बने प्रसाद का भोग अर्पित करता है, कथा सुनता है और सबको आदरपूर्वक प्रसाद वितरित करता है, उसके जीवन के सभी संकट दूर हो जाते हैं। उसे धन, धान्य, संतान और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है तथा अंततः मोक्ष प्राप्त होता है। यह भी कहा गया है कि जो मनुष्य इस व्रत का संकल्प लेकर उसे भुला देता है या भगवान के प्रसाद का अनादर करता है, उसे कष्टों का सामना करना पड़ता है, जैसा साधु वैश्य और राजा तुंगध्वज की कथाओं में देखा गया। इसलिए इस व्रत को सदैव श्रद्धा, नियम और विनम्रता के साथ करना चाहिए। सूत जी ने कहा, "हे मुनिश्रेष्ठो! जो कोई भी इस सत्यनारायण कथा को सुनता, पढ़ता अथवा सुनाता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और अंत में उसे भगवान विष्णु के परम धाम की प्राप्ति होती है।" इस प्रकार श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पंचम अध्याय सम्पूर्ण हुआ। इति श्री स्कन्द पुराण रेवाखण्डान्तर्गत श्री सत्यनारायण व्रत कथा सम्पूर्णम्। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।