संतोषी व्रत कथा

मन की शांति, कष्टों से मुक्ति और सुख-समृद्धि के लिए

व्रत कथा · 13 बार पढ़ा गया
रोहन

जय संतोषी माता!

संतोषी माता की कथा भारत में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ सुनी और सुनाई जाती है। यह व्रत विशेष रूप से शुक्रवार के दिन किया जाता है और माना जाता है कि इसे सच्चे मन से करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं, जीवन के कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है।

व्रत के नियम

यह व्रत लगातार सोलह शुक्रवार तक किया जाता है। इस दौरान खट्टी वस्तुएँ — जैसे इमली, नींबू, दही आदि — ग्रहण नहीं की जातीं। पूजा में गुड़ और चने का भोग माता को अर्पित किया जाता है, और वही प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। व्रत के दिन क्रोध न करना, किसी को अपशब्द न कहना और मन को शांत व संतुष्ट रखना आवश्यक माना गया है — क्योंकि "संतोष" स्वयं इस व्रत की आत्मा है।

कथा

प्राचीन काल में एक नगर में हरिदास नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह बड़ा ही धर्मात्मा और सत्कर्मों में निपुण था। उसकी पत्नी का नाम सुमति था। दोनों पति-पत्नी बड़े प्रेम और श्रद्धा से रहते थे, परन्तु वर्षों बीत जाने पर भी उनकी कोई संतान नहीं हुई। वे अनेक तीर्थों की यात्रा करते, अनेक देवी-देवताओं की पूजा करते, पर उनकी यह इच्छा पूर्ण नहीं होती थी।

एक रात हरिदास ने स्वप्न में देखा कि संतोषी माता स्वयं प्रकट हुई हैं। माता ने कहा, "हे हरिदास! तुम शुक्रवार के दिन मेरी पूजा करो और सोलह शुक्रवार का व्रत रखो। मैं तुम्हें संतान भी दूंगी और सुख-समृद्धि भी।" हरिदास ने माता की आज्ञा शिरोधार्य की और श्रद्धापूर्वक व्रत आरम्भ कर दिया।

जैसे-जैसे शुक्रवार बीतते गए, हरिदास के घर में सुख-शांति का वास होने लगा। कुछ ही समय में उन्हें पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। सोलह शुक्रवार पूर्ण होने पर हरिदास और सुमति ने विधिपूर्वक उद्यापन किया और तब से यह व्रत उनके घर की परंपरा बन गया।

नगर में एक धनी व्यक्ति था, जिसने इस साधारण-से व्रत का उपहास किया — "भला गुड़-चने के भोग से क्या लाभ होगा?" परन्तु उसकी पत्नी ने माता की महिमा को समझा और श्रद्धापूर्वक व्रत आरम्भ किया। थोड़े ही दिनों में उसके घर भी सुख-समृद्धि लौट आई, और उस व्यक्ति को अपने वचनों पर पश्चाताप हुआ।

धीरे-धीरे संतोषी माता के इस व्रत की महिमा पूरे नगर में फैल गई। जो भी श्रद्धा, नियम और संतोष के साथ इसे करता, उसकी सभी बाधाएँ दूर होतीं और मनोकामनाएँ पूर्ण होतीं।

व्रत के लाभ

संतोषी माता के व्रत से मन को शांति मिलती है, जीवन के कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। संतान-सुख की कामना रखने वालों को माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह व्रत मनुष्य को "संतोष" नामक वह गुण सिखाता है, जिसके बिना कोई भी सुख-समृद्धि सच्चे अर्थों में पूर्ण नहीं होती।

जय संतोषी माता!