संकटों से मुक्ति, सौभाग्य और मातृशक्ति की प्राप्ति के लिए
रोहन
जय गणेश जी! जय श्री हरि!
हरतालिका तीज व्रत सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से रखा जाता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है और भाद्रपद माह की तृतीया को मनाया जाता है।
व्रत के नियम
यह व्रत निर्जला अर्थात बिना जल ग्रहण किए रखा जाता है। स्त्रियाँ सोलह श्रृंगार कर शिव-पार्वती की बालू अथवा मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजा करती हैं। रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन किया जाता है और अगले दिन विधिपूर्वक व्रत का पारण किया जाता है।
कथा
माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर घोर तपस्या की थी। उनके पिता हिमराज ने भगवान विष्णु के साथ उनका विवाह तय कर दिया, परन्तु पार्वती जी का मन केवल शिवजी में रमा हुआ था।
यह जानकर पार्वती जी अत्यंत दुखी हुईं और अपनी सखी के साथ घने वन में जाकर कठोर तपस्या करने लगीं। उन्होंने अन्न-जल त्यागकर वर्षों तक शिवजी की आराधना की। उनकी अटूट भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वचन दिया।
जिस दिन माता पार्वती को शिवजी की प्राप्ति हुई, वह भाद्रपद तृतीया का दिन था — इसी स्मृति में हरतालिका तीज व्रत का आरम्भ हुआ। तभी से सुहागिन स्त्रियाँ इस दिन अपने पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से यह व्रत रखती हैं।
व्रत के लाभ
हरतालिका व्रत करने से दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बना रहता है, पति की आयु लंबी होती है तथा माता पार्वती और शिवजी दोनों की कृपा प्राप्त होती है।
जय माता पार्वती, जय भोलेनाथ!