जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · दुख और कठिन समय

“खुशी टिकती क्यों नहीं? हर खुशी के बाद फिर वही खालीपन।”

गीता का छोटा जवाब

गीता कहती है कि बाहर की चीज़ों से मिलने वाला सुख शुरू और अंत वाला है, इसलिए टिकता नहीं। टिकने वाला सुख भीतर है — जिसे बुद्धि पहचानती है और जिसे पाकर मनुष्य बड़े दुख में भी नहीं डगमगाता।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. बाहर का सुख आता-जाता है

    इंद्रियों और विषयों से मिलने वाले भोग शुरू और अंत वाले हैं, इसलिए समझदार उनमें नहीं रमता।

    गीता 5.22 श्रीकृष्ण

    ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
    आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥

    हिंदी अर्थक्योंकि हे कुन्तीनन्दन ! जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।

    रोमन में पढ़ें

    ye hi sansparśha-jā bhogā duḥkha-yonaya eva te
    ādyantavantaḥ kaunteya na teṣhu ramate budhaḥ

    अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
  2. सुख के तीन प्रकार

    जो सुख शुरू में कठिन लगे पर अंत में अमृत बने, वह सात्त्विक है — वह भीतर की प्रसन्नता से पैदा होता है।

    गीता 18.36 से 18.37 श्रीकृष्ण

    इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

    सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
    अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ 18.36 ॥
    यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
    तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ 18.37 ॥

    हिंदी अर्थहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

    रोमन में पढ़ें

    sukhaṁ tv idānīṁ tri-vidhaṁ śhṛiṇu me bharatarṣhabha
    abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṁ cha nigachchhati
    yat tad agre viṣham iva pariṇāme ‘mṛitopamam
    tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam
    yat tad agre viṣam iva pariṇāme 'mṛtopamam tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  3. टिकने वाला सुख भीतर है

    जो सुख इंद्रियों से परे है और बुद्धि से पहचाना जाता है, उसे पाकर मनुष्य फिर डगमगाता नहीं — बड़ा दुख भी उसे हिला नहीं पाता।

    गीता 6.21 श्रीकृष्ण

    सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
    वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥

    हिंदी अर्थजो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्त्वसे विचलित नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    sukham ātyantikaṁ yat tad buddhi-grāhyam atīndriyam
    vetti yatra na chaivāyaṁ sthitaśh chalati tattvataḥ

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
    गीता 6.22 श्रीकृष्ण

    यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
    यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥

    हिंदी अर्थजिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता।

    रोमन में पढ़ें

    yaṁ labdhvā chāparaṁ lābhaṁ manyate nādhikaṁ tataḥ
    yasmin sthito na duḥkhena guruṇāpi vichālyate

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  4. आते-जाते को सहना

    सुख-दुःख अनित्य हैं — इन्हें पहचानकर सहन करना सीखिए।

    गीता 2.14 श्रीकृष्ण

    मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
    आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

    हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो।

    रोमन में पढ़ें

    mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ
    āgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि खुश होना गलत है या जीवन के सुख छोड़ दो। वह कहती है — सुख का आधार बाहर से भीतर ले आओ।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।