जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · दुख और कठिन समय

“यह बीमारी मुझे (या मेरे अपने को) ही क्यों हुई?”

गीता का छोटा जवाब

गीता जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग को शरीर का स्वभाव मानती है — यह किसी की सज़ा नहीं। शरीर बदलता है, भीतर का “मैं” नहीं; और इस कठिन समय में भी भगवान अपने भक्त का ध्यान रखते हैं।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. रोग शरीर का स्वभाव है

    जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और रोग में दुख-दोष को समझना — गीता इसे ज्ञान का एक लक्षण कहती है। ये शरीर के साथ जुड़े हैं, किसी का दंड नहीं।

    गीता 13.8 श्रीकृष्ण

    इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
    जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥

    हिंदी अर्थइन्द्रियोंके विषयोंमें वैराग्यका होना, अहंकारका भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियोंमें दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखना।

    रोमन में पढ़ें

    indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha
    janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam

    अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
  2. शरीर बदलता है, आप नहीं

    जैसे इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आते हैं, वैसे ही सब बदलाव शरीर के हैं — भीतर का आत्मा वही रहता है।

    गीता 2.13 श्रीकृष्ण

    देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
    तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

    हिंदी अर्थदेहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā
    tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  3. कठिन समय अनित्य है

    सुख-दुःख आते-जाते हैं — धैर्य से सहन कीजिए।

    गीता 2.14 श्रीकृष्ण

    मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
    आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

    हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो।

    रोमन में पढ़ें

    mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ
    āgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  4. आपकी देखभाल हो रही है

    जो भगवान पर भरोसा रखते हैं, उनका योगक्षेम भगवान स्वयं संभालते हैं।

    गीता 9.22 श्रीकृष्ण

    अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
    तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

    हिंदी अर्थजो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।

    रोमन में पढ़ें

    ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate
    teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि बीमारी किसी पाप की सज़ा है, न यह कि इलाज छोड़कर सिर्फ़ प्रार्थना करो। स्वास्थ्य के लिए डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।