गीता 9.30 श्रीकृष्ण अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ हिंदी अर्थअगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है। रोमन में पढ़ें api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ