अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #11 · मन और आदतें गलती बनाम सच

आपसे एक बड़ी गलती हो गई है, जो अभी किसी को पता नहीं। आप क्या करेंगे?

गलती छिपाना आसान लगता है, पर उसका बोझ मन पर रहता है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता गलती के बाद रुकने को नहीं, मुड़ने को कहती है। सच स्वीकारना और आगे सही आचरण — यही शुद्धि का रास्ता है।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. छिपा लूँगा — गीता दैवी गुणों में “सत्य” और “अकर्तव्य करने में लज्जा” गिनाती है (16.2)। छिपाने से बात बाहर भले न आए, बोझ भीतर रहता है।

B. खुद को सज़ा देता रहूँगा — गीता कहती है — सबसे बड़ा पापी भी ज्ञान की नौका से पार हो जाता है (4.36)। पछतावा ज़रूरी है, पर उसमें डूबे रहना नहीं — “चिंता मत कर” (18.66)।

C. मान लूँगा और सुधारूँगा — यह गीता के करीब है — सत्य और सरलता दैवी गुण हैं (16.1–2), और जिसने सही निश्चय कर लिया, वह शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है (9.30–31)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 16.1 श्रीकृष्ण

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥

हिंदी अर्थभयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।

रोमन में पढ़ें

śhrī-bhagavān uvācha
abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ
dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.2 श्रीकृष्ण

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

हिंदी अर्थअहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव।

रोमन में पढ़ें

ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam
dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 4.36 श्रीकृष्ण

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥

हिंदी अर्थअगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा।

रोमन में पढ़ें

api ched asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛit-tamaḥ
sarvaṁ jñāna-plavenaiva vṛijinaṁ santariṣhyasi

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 4.37 श्रीकृष्ण

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको सर्वथा भस्म कर देती है।

रोमन में पढ़ें

yathaidhānsi samiddho ’gnir bhasma-sāt kurute ’rjuna
jñānāgniḥ sarva-karmāṇi bhasma-sāt kurute tathā

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 9.30 श्रीकृष्ण

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥

हिंदी अर्थअगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।

रोमन में पढ़ें

api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk
sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 9.31 श्रीकृष्ण

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

हिंदी अर्थवह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता।

रोमन में पढ़ें

kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati
kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 18.66 श्रीकृष्ण

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

हिंदी अर्थसम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।

रोमन में पढ़ें

sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja
ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

सभी दुविधाएँ देखें · जीवन-विषयों से गीता