गीता 5.3
कुंडलीपंचांग

भगवद्गीता · अध्याय 5 · श्लोक 3

गीता 5.3

अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता 5.3 श्रीकृष्ण

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥

हिंदी अर्थहे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣhṭi na kāṅkṣhati
nirdvandvo hi mahā-bāho sukhaṁ bandhāt pramuchyate

यह श्लोक इन विषयों में

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। शीर्षक, सरल भावार्थ, मुख्य शब्द और "आज के जीवन में" SachiBhakti की ओर से।