गीता 16.15
कुंडलीपंचांग

भगवद्गीता · अध्याय 16 · श्लोक 15

गीता 16.15

अध्याय 16 – दैवासुरसम्पद्विभागयोग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता 16.15 श्रीकृष्ण

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥

हिंदी अर्थहम धनवान् हैं, बहुत-से मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान और कौन है? हम खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे और मौज करेंगे -- इस तरह वे अज्ञानसे मोहित रहते हैं।

रोमन में पढ़ें

āḍhyo ’bhijanavān asmi ko ’nyo ’sti sadṛiśho mayā
yakṣhye dāsyāmi modiṣhya ity ajñāna-vimohitāḥ
aneka-chitta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛitāḥ
prasaktāḥ kāma-bhogeṣhu patanti narake ’śhuchau

यह श्लोक इन विषयों में

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। शीर्षक, सरल भावार्थ, मुख्य शब्द और "आज के जीवन में" SachiBhakti की ओर से।