अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #21 · पैसा दिखावा बनाम सादगी

शादी या त्योहार पर क़र्ज़ लेकर भी बड़ा ख़र्च करें, ताकि लोग कुछ न कहें? आप क्या करेंगे?

“लोग क्या कहेंगे” — ख़र्च का सबसे बड़ा कारण अक्सर यही होता है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता उत्सव या दान के विरोध में नहीं है — विरोध दिखावे के है। जो भी किया जाए, श्रद्धा से हो, “लोग क्या कहेंगे” से नहीं (17.12, 17.28)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. हाँ, इज़्ज़त का सवाल है — गीता दिखावे के लिए किए यज्ञ को राजस कहती है (17.12), और धन-मान के मद में किए आयोजन को आसुरी भाव (16.17)।

B. जितनी चादर, उतने पैर — संयम और संतोष गीता के प्रिय गुण हैं — जो “जिस-किसी प्रकार भी संतुष्ट” है, वह भगवान को प्रिय है (12.18–19)।

C. सादगी से, और बचत से कुछ दान — यह सात्त्विक भाव के करीब है — दान वही श्रेष्ठ जो कर्तव्य मानकर, बिना दिखावे दिया जाए (17.20)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 17.12 श्रीकृष्ण

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥

हिंदी अर्थपरन्तु हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ फलकी इच्छाको लेकर अथवा दम्भ-(दिखावटीपन-) के लिये भी किया जाता है, उसको तुम राजस समझो।

रोमन में पढ़ें

abhisandhāya tu phalaṁ dambhārtham api chaiva yat
ijyate bharata-śhreṣhṭha taṁ yajñaṁ viddhi rājasam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 16.15 श्रीकृष्ण

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥

हिंदी अर्थहम धनवान् हैं, बहुत-से मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान और कौन है? हम खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे और मौज करेंगे -- इस तरह वे अज्ञानसे मोहित रहते हैं।

रोमन में पढ़ें

āḍhyo ’bhijanavān asmi ko ’nyo ’sti sadṛiśho mayā
yakṣhye dāsyāmi modiṣhya ity ajñāna-vimohitāḥ
aneka-chitta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛitāḥ
prasaktāḥ kāma-bhogeṣhu patanti narake ’śhuchau

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.17 श्रीकृष्ण

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥

हिंदी अर्थअपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, अकड़ रखनेवाले तथा धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले वे मनुष्य दम्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंसे यजन करते हैं।

रोमन में पढ़ें

ātma-sambhāvitāḥ stabdhā dhana-māna-madānvitāḥ
yajante nāma-yajñais te dambhenāvidhi-pūrvakam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 17.20 श्रीकृष्ण

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थदान देना कर्तव्य है -- ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

dātavyam iti yad dānaṁ dīyate ‘nupakāriṇe
deśhe kāle cha pātre cha tad dānaṁ sāttvikaṁ smṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.28 श्रीकृष्ण

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ ! अश्रद्धासे किया हुआ हवन, दिया हुआ दान और तपा हुआ तप तथा और भी जो,कुछ किया जाय, वह सब 'असत्' -- ऐसा कहा जाता है। उसका फल न यहाँ होता है, न मरनेके बाद ही होता है अर्थात् उसका कहीं भी सत् फल नहीं होता।

रोमन में पढ़ें

aśhraddhayā hutaṁ dattaṁ tapas taptaṁ kṛitaṁ cha yat
asad ity uchyate pārtha na cha tat pretya no iha

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 12.18 से 12.19 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥

हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

रोमन में पढ़ें

samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग

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