शनि चालीसा

कष्टों से मुक्ति, न्याय और जीवन में स्थिरता के लिए

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रोहन

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥ चार भुजा तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छवि छाजै॥

परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥ कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै। हिय माल मुक्तन मणि दमकै॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥ सूर्य पुत्र काले वरण, यम के अनुज कहाय। कौवा वाहन सदा तुम्हारा, न्याय करत सुखदाय॥

जो तुम ताड़ें राजा रंक। हवे रंक से राजा रंक॥ रावण को दिय राज विभीषण। जाकी कृपा भई अस भीषण॥

नल से भूप भये भिखारी। सुनी हठिली दासी रजधारी॥ शनि जब हृदय अपने से भूलत। नारायन धर सिंहासन डूलत॥

रामचंद्र जब वनवास कीन्हा। रावण मुख विनाश करा दियो॥ इस भांति कृपा तुम कीन्हो। पूजा हित यह पाठ प्रवीना॥

जो कोई नित नेम से गावे। सुख संपत्ति पूरन ह्वै पावे॥ शनि देव कृपा करो हम पर। मंगल दोष मिटाओ हमारे॥

न्याय के तुम प्रभु अधिकारी। कर्म फल देत सबहिं भारी॥ सेवा भक्ति भाव जो लावे। शनि की कृपा वही तो पावे॥

जय जय जय शनिदेव कृपाला। दीन दुखी जन प्रतिपाला॥

दोहा: शनि चालीसा पाठ कर, पावे सुख कल्याण। कर्म फल के स्वामी तुम, राखो जन का मान॥