श्री राम चालीसा

संकटों से मुक्ति, मन की शांति और जीवन में विजय के लिए

चालीसा · 10 बार पढ़ा गया
रोहन

श्री रघुवीर भक्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥ निशिदिन ध्यान धरे जो कोई। ता सम भक्त और नहिं होई॥

अजर अमर अविनाशी स्वामी। सब घट वासी अंतरयामी॥ कौशल्या नन्दन बड़भागी। दशरथ के घर जन्में त्यागी॥

भरत लखन शत्रुघ्न सहाई। चारों भ्राता प्रेम अधाई॥ गुरु विश्वामित्र संग सिधाए। ताड़का आदि दनुज पचाए॥

जनकपुरी शिव धनुष चढ़ायो। सिय स्वयंवर विजय कहायो॥ पितु आज्ञा शिर धारि सुजाना। वन को चले सहित सिय आना॥

लखन सहित वन बास बितायो। ऋषि मुनियन को त्रास मिटायो॥ मृग रूपी मारीच संहारा। रावण हर लै गयो दुलारा॥

सुग्रीव संग मित्रता कीन्ही। बालि वध करि राजपद दीन्ही॥ सिय खोजन पठये कपि सारे। हनुमत जाय लंक दृग तारे॥

सेतु बांधि लंका पर धाए। रावण आदि असुर सब घाए॥ विभीषण को दीन्ह भो राज। सिय सहित अवध लौटे महाराज॥

अवधपुरी में राज कमायो। रामराज्य सुख सबहिं पायो॥ भरत लखन शत्रुघ्न दुलारे। सिय सुत लव कुश जग उजियारे॥

जो यह पढ़े रामायण जैसे। पावे सुख सम्पत्ति तैसे॥ संकट कटे मिटे सब पीरा। जो सुमिरे रघुनाथ शरीरा॥

राम भजन बिनु सुख नहिं होई। जो पूछो सुरनर मुनि कोई॥ रामचंद्र कृपालु भजु जो प्रानी। भव सागर तर जाय अभिमानी॥

जय जय जय रघुनाथ कृपाला। सदा करहु सन्तन प्रतिपाला॥

दोहा: नित प्रति पाठ करे जो कोई, राम चालीसा एह। पूरण होय मनोरथ ताको, बढ़े प्रेम अरु नेह॥