गीता 5.8
कुंडलीपंचांग

भगवद्गीता · अध्याय 5 · श्लोक 8

गीता 5.8

अध्याय 5 – कर्मसंन्यासयोग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता 5.8 श्रीकृष्ण

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यन् शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन् ॥

हिंदी अर्थतत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने।

रोमन में पढ़ें

naiva kiñchit karomīti yukto manyeta tattva-vit
paśhyañ śhṛiṇvan spṛiśhañjighrann aśhnangachchhan svapañśhvasan
pralapan visṛijan gṛihṇann unmiṣhan nimiṣhann api
indriyāṇīndriyārtheṣhu vartanta iti dhārayan

यह श्लोक इन विषयों में

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। शीर्षक, सरल भावार्थ, मुख्य शब्द और "आज के जीवन में" SachiBhakti की ओर से।