गीता 18.53
कुंडलीपंचांग

भगवद्गीता · अध्याय 18 · श्लोक 53

गीता 18.53

अध्याय 18 – मोक्षसंन्यासयोग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता 18.53 श्रीकृष्ण

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

हिंदी अर्थजो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ parigraham
vimuchya nirmamaḥ śhānto brahma-bhūyāya kalpate

यह श्लोक इन विषयों में

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। शीर्षक, सरल भावार्थ, मुख्य शब्द और "आज के जीवन में" SachiBhakti की ओर से।