गीता 18.17 श्रीकृष्ण यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ हिंदी अर्थजिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है। रोमन में पढ़ें yasya nāhankṛito bhāvo buddhir yasya na lipyate hatvā ‘pi sa imāl lokān na hanti na nibadhyate