गीता 13.10 श्रीकृष्ण मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ हिंदी अर्थमेरेमें अनन्ययोगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्तिका होना, एकान्त स्थानमें रहनेका स्वभाव होना और जन-समुदायमें प्रीतिका न होना। रोमन में पढ़ें mayi chānanya-yogena bhaktir avyabhichāriṇī vivikta-deśha-sevitvam aratir jana-sansadi