गीता 9.3
कुंडलीपंचांग

भगवद्गीता · अध्याय 9 · श्लोक 3

गीता 9.3

अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता 9.3 श्रीकृष्ण

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥

हिंदी अर्थहे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

रोमन में पढ़ें

aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa
aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani

यह श्लोक इन विषयों में

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। शीर्षक, सरल भावार्थ, मुख्य शब्द और "आज के जीवन में" SachiBhakti की ओर से।