गीता 3.33 श्रीकृष्ण सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ हिंदी अर्थसम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा? रोमन में पढ़ें sadṛiśhaṁ cheṣhṭate svasyāḥ prakṛiter jñānavān api prakṛitiṁ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṁ kariṣhyati