गीता 17.17 श्रीकृष्ण श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ हिंदी अर्थपरम श्रद्धासे युक्त फलेच्छारहित मनुष्योंके द्वारा तीन प्रकार-(शरीर, वाणी और मन-) का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं। रोमन में पढ़ें śhraddhayā parayā taptaṁ tapas tat tri-vidhaṁ naraiḥ aphalākāṅkṣhibhir yuktaiḥ sāttvikaṁ parichakṣhate