रुद्राष्टकम्

9 श्लोक · चयनित मूल पाठ

अष्टक · 1 बार पढ़ा गया
रोहन

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् । निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥ १ ॥

निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकालकालं कृपालुं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥ २ ॥

तुषाराद्रिसङ्काशगौरं गभीरं मनोभूतकोटिप्रभाश्रीशरीरम् । स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गम् ॥ ३ ॥

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालुम् । मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥ ४ ॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डमजं भानुकोटिप्रकाशम् । त्रयःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ ५ ॥

कलातीतकल्याणकल्पान्तकारी सदासज्जनानन्ददाता पुरारी । चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ ६ ॥

न यावदुमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥ ७ ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् । जराजन्मदुःखौघतातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ ८ ॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतुष्टये । ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥ ९ ॥