अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #20 · पैसा मदद बनाम विवेक

एक दोस्त फिर से पैसे माँग रहा है, पिछली बार वाले अभी लौटाए नहीं। आप क्या करेंगे?

मना करो तो रिश्ता बिगड़ने का डर, दो तो अपना नुकसान।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता देने को कर्तव्य मानती है, पर आँख बंद करके नहीं — देश, काल और पात्र देखकर, बिना अहंकार और बिना कड़वाहट के।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. फिर दे दूँगा — देना अच्छा है, पर गीता देने में “पात्र” और “समय” देखने को कहती है (17.20); बिना विचार, अयोग्य जगह दिया दान तामस बताया गया है (17.22)।

B. साफ़ मना कर दूँगा — मना करना गलत नहीं — यह विवेक है। बस मना करते हुए वाणी कड़वी न हो (17.15)।

C. क्षमता भर मदद, और पुरानी बात साफ़ करूँगा — यह गीता के सात्त्विक दान के करीब है — देश, काल और पात्र देखकर (17.20) — और सच को मधुरता से कहना (17.15)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 17.20 श्रीकृष्ण

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थदान देना कर्तव्य है -- ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

dātavyam iti yad dānaṁ dīyate ‘nupakāriṇe
deśhe kāle cha pātre cha tad dānaṁ sāttvikaṁ smṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.21 श्रीकृष्ण

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थकिन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

yat tu pratyupakārārthaṁ phalam uddiśhya vā punaḥ
dīyate cha parikliṣhṭaṁ tad dānaṁ rājasaṁ smṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.22 श्रीकृष्ण

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थजो दान बिना सत्कारके तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और कालमें कुपात्रको दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

adeśha-kāle yad dānam apātrebhyaśh cha dīyate
asat-kṛitam avajñātaṁ tat tāmasam udāhṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग

सभी दुविधाएँ देखें · जीवन-विषयों से गीता