दुविधा #25 · रिश्ते और दोस्तीटूटा रिश्ता बनाम आगे का जीवन
एक गहरा रिश्ता टूट गया है और आप उसे भूल नहीं पा रहे। आप क्या करेंगे?
बार-बार वही बातें, वही यादें मन में लौटती हैं।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता कहती है कि संयोग से होने वाले सुख आदि-अंत वाले हैं (5.22), और सुख-दुःख मौसम की तरह आते-जाते हैं (2.14)। दुःख को मानना ठीक है — उसमें डूबे रहना नहीं।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. उसे वापस पाने की हर कोशिश करूँगा — गीता कहती है जिसका बार-बार चिंतन हो, उसी से आसक्ति गहरी होती है (2.62)। पकड़ जितनी कसी, दुःख उतना गहरा।
B. खुद को दोष देता रहूँगा — गीता 6.5 कहती है — अपना पतन मत करो; मन अपना मित्र भी है और शत्रु भी। खुद को कोसना मन को शत्रु बनाना है।
C. दुःख स्वीकारकर धीरे-धीरे आगे बढ़ूँगा — यह गीता के करीब है — सुख-दुःख आने-जाने वाले हैं, उन्हें सहन करो (2.14); और प्रसन्न मन में सब दुःख मिटने लगते हैं (2.65)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
इन श्लोकों में देखें
इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक
गीता 2.14श्रीकृष्ण
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो।
रोमन में पढ़ें
mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ
āgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata
हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
हिंदी अर्थक्योंकि हे कुन्तीनन्दन ! जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।
रोमन में पढ़ें
ye hi sansparśha-jā bhogā duḥkha-yonaya eva te
ādyantavantaḥ kaunteya na teṣhu ramate budhaḥ
हिंदी अर्थवशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।