दूसरों की पोस्ट देखकर लगता है सबकी ज़िंदगी आपसे बेहतर है। आप क्या करेंगे?
घूमना, नई गाड़ी, खुशियाँ — स्क्रीन पर सबके पास सब कुछ है।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता तुलना से नहीं, स्वधर्म और संतोष से चलने को कहती है — जो अपने-आप में संतुष्ट है, वही स्थिर है (2.55)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. मैं भी वैसी ही पोस्ट करूँगा — गीता दिखावे के लिए किए कर्म को राजस कहती है (17.12, 17.18)। दिखावा तुलना का जवाब नहीं, उसी का दूसरा रूप है।
B. ऐप ही हटा दूँगा — दूरी मन की रक्षा हो सकती है। पर गीता 2.59 याद दिलाती है — विषय दूर होने से रस नहीं जाता; असली बदलाव भीतर होता है।
C. याद रखूँगा कि यह पूरा सच नहीं — यह गीता के करीब है — जो कुछ मिले उसमें संतुष्ट और ईर्ष्या-रहित (4.22), और अपने धर्म पर ध्यान (3.35)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
इन श्लोकों में देखें
इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक
गीता 4.22श्रीकृष्ण
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥
हिंदी अर्थजो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।
रोमन में पढ़ें
yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ
samaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate
हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।
हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
हिंदी अर्थनिराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।