अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #31 · समाज सोशल मीडिया बनाम संतोष

दूसरों की पोस्ट देखकर लगता है सबकी ज़िंदगी आपसे बेहतर है। आप क्या करेंगे?

घूमना, नई गाड़ी, खुशियाँ — स्क्रीन पर सबके पास सब कुछ है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता तुलना से नहीं, स्वधर्म और संतोष से चलने को कहती है — जो अपने-आप में संतुष्ट है, वही स्थिर है (2.55)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. मैं भी वैसी ही पोस्ट करूँगा — गीता दिखावे के लिए किए कर्म को राजस कहती है (17.12, 17.18)। दिखावा तुलना का जवाब नहीं, उसी का दूसरा रूप है।

B. ऐप ही हटा दूँगा — दूरी मन की रक्षा हो सकती है। पर गीता 2.59 याद दिलाती है — विषय दूर होने से रस नहीं जाता; असली बदलाव भीतर होता है।

C. याद रखूँगा कि यह पूरा सच नहीं — यह गीता के करीब है — जो कुछ मिले उसमें संतुष्ट और ईर्ष्या-रहित (4.22), और अपने धर्म पर ध्यान (3.35)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 4.22 श्रीकृष्ण

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

हिंदी अर्थजो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।

रोमन में पढ़ें

yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ
samaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 3.35 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 2.55 श्रीकृष्ण

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha mano-gatān
ātmany-evātmanā tuṣhṭaḥ sthita-prajñas tadochyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 17.12 श्रीकृष्ण

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥

हिंदी अर्थपरन्तु हे भरतश्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ फलकी इच्छाको लेकर अथवा दम्भ-(दिखावटीपन-) के लिये भी किया जाता है, उसको तुम राजस समझो।

रोमन में पढ़ें

abhisandhāya tu phalaṁ dambhārtham api chaiva yat
ijyate bharata-śhreṣhṭha taṁ yajñaṁ viddhi rājasam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 2.59 श्रीकृष्ण

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥

हिंदी अर्थनिराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ
rasa-varjaṁ raso ’pyasya paraṁ dṛiṣhṭvā nivartate

अध्याय 2 · सांख्ययोग

सभी दुविधाएँ देखें · जीवन-विषयों से गीता