टीम ने मिलकर काम किया, पर तारीफ़ सिर्फ़ आपको मिल रही है। आप क्या करेंगे?
दफ़्तर, परिवार या कोई आयोजन — तारीफ़ अक्सर उसे मिलती है जो सामने दिखता है।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता के अनुसार कोई भी कर्म अकेले “मैं” से नहीं होता — अधिष्ठान, कर्ता, साधन, चेष्टा और दैव, पाँच कारण मिलकर कर्म बनाते हैं (18.14)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. चुपचाप तारीफ़ ले लूँगा — गीता 3.27 कहती है कि अहंकार से मोहित मनुष्य ही मानता है “मैं कर्ता हूँ”, जबकि कर्म कई कारणों के मिलने से होता है (18.14)।
B. पूरी टीम का नाम लूँगा — यह गीता के “अमानित्व” — अपने में श्रेष्ठता का भाव न होना — के करीब है (13.7)। 3.21 भी कहता है कि आगे वाला जो करता है, दूसरे वही सीखते हैं।
C. तारीफ़ से मुझे फ़र्क नहीं पड़ता — गीता स्थिर व्यक्ति को निंदा-स्तुति में सम बताती है (12.18–19)। बस ध्यान रहे कि “फ़र्क नहीं पड़ता” के साथ दूसरों का हक़ न छूट जाए।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थसम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
हिंदी अर्थइसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।
रोमन में पढ़ें
adhiṣhṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ cha pṛithag-vidham
vividhāśh cha pṛithak cheṣhṭā daivaṁ chaivātra pañchamam
हिंदी अर्थपरन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।
रोमन में पढ़ें
tatraivaṁ sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥ
paśhyaty akṛita-buddhitvān na sa paśhyati durmatiḥ
हिंदी अर्थमानित्व-(अपनेमें श्रेष्ठताके भाव-) का न होना, दम्भित्व-(दिखावटीपन-) का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, स्थिरता और मनका वशमें होना।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
हिंदी अर्थश्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।
रोमन में पढ़ें
yad yad ācharati śhreṣhṭhas tat tad evetaro janaḥ
sa yat pramāṇaṁ kurute lokas tad anuvartate
गीता 12.18 से 12.19श्रीकृष्ण
इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥
हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।
रोमन में पढ़ें
samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ