अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #14 · परिवार सेवा बनाम करियर

बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए एक बड़ा मौका छोड़ना पड़ सकता है। आप क्या करेंगे?

ऐसे फ़ैसलों में कोई भी रास्ता पूरी तरह आसान नहीं होता।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता यहाँ कोई एक नियम नहीं देती। वह पूछती है — निर्णय कामना से है या कर्तव्य से? जो भी चुनें, उसे पूरे मन से, बिना पछतावे और बिना अहंकार के निभाना ही कर्मयोग है।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. मौका छोड़कर उनके पास रहूँगा — दूसरों के लिए किए कर्म को गीता “यज्ञ” कहती है, जो बाँधता नहीं (3.9)। बस त्याग कर्तव्य मानकर हो, ताकि बाद में पछतावा न पले — वही सात्त्विक त्याग है (18.9)।

B. मौका लूँगा, देखभाल का इंतज़ाम करके — अपने कर्म में लगना भी पूजा है (18.46)। गीता बाहरी फ़ैसले से ज़्यादा यह देखती है कि वह स्वार्थ से है या कर्तव्य से।

C. बीच का रास्ता निकालूँगा — गीता का ज़ोर भीतर के भाव पर है — आसक्ति छोड़कर जो भी कर्तव्य निभाया जाए, वही कर्मयोग है (3.19)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 3.9 श्रीकृष्ण

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥

हिंदी अर्थयज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये हे कुन्तीनन्दन ! तू आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्य-कर्म कर।

रोमन में पढ़ें

yajñārthāt karmaṇo ’nyatra loko ’yaṁ karma-bandhanaḥ
tad-arthaṁ karma kaunteya mukta-saṅgaḥ samāchara

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.19 श्रीकृष्ण

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

हिंदी अर्थइसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

tasmād asaktaḥ satataṁ kāryaṁ karma samāchara
asakto hyācharan karma param āpnoti pūruṣhaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 18.9 श्रीकृष्ण

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन ! 'केवल कर्तव्यमात्र करना है' -- ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है।

रोमन में पढ़ें

kāryam ity eva yat karma niyataṁ kriyate ‘rjuna
saṅgaṁ tyaktvā phalaṁ chaiva sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.46 श्रीकृष्ण

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam
sva-karmaṇā tam abhyarchya siddhiṁ vindati mānavaḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 2.47 श्रीकृष्ण

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

हिंदी अर्थकर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।

रोमन में पढ़ें

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi

अध्याय 2 · सांख्ययोग

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