बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए एक बड़ा मौका छोड़ना पड़ सकता है। आप क्या करेंगे?
ऐसे फ़ैसलों में कोई भी रास्ता पूरी तरह आसान नहीं होता।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता यहाँ कोई एक नियम नहीं देती। वह पूछती है — निर्णय कामना से है या कर्तव्य से? जो भी चुनें, उसे पूरे मन से, बिना पछतावे और बिना अहंकार के निभाना ही कर्मयोग है।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. मौका छोड़कर उनके पास रहूँगा — दूसरों के लिए किए कर्म को गीता “यज्ञ” कहती है, जो बाँधता नहीं (3.9)। बस त्याग कर्तव्य मानकर हो, ताकि बाद में पछतावा न पले — वही सात्त्विक त्याग है (18.9)।
B. मौका लूँगा, देखभाल का इंतज़ाम करके — अपने कर्म में लगना भी पूजा है (18.46)। गीता बाहरी फ़ैसले से ज़्यादा यह देखती है कि वह स्वार्थ से है या कर्तव्य से।
C. बीच का रास्ता निकालूँगा — गीता का ज़ोर भीतर के भाव पर है — आसक्ति छोड़कर जो भी कर्तव्य निभाया जाए, वही कर्मयोग है (3.19)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थयज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये हे कुन्तीनन्दन ! तू आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्य-कर्म कर।
हिंदी अर्थइसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।