अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #39 · रिश्ते और दोस्ती सच बनाम दोस्त को बचाना

आपके पक्के दोस्त ने दफ़्तर में एक गड़बड़ी की है। मैनेजर आपसे पूछता है — “क्या तुम्हें कुछ पता है?” आप क्या करेंगे?

दोस्ती निभानी है, पर झूठ बोलना भी मन को ठीक नहीं लगता।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता में सत्य और हित साथ चलते हैं (17.15)। सच्चा मित्र वह है जो भला चाहे (5.29) — ग़लती ढकने वाला नहीं, उसे सुधारने में साथ देने वाला।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. झूठ बोलकर दोस्त को बचा लूँगा — गीता सत्य को दैवी गुण कहती है (16.2)। झूठ से दोस्त आज बच जाए, पर गलती सुधरने का मौका छिन जाता है — और आप भी उसी गड़बड़ी का हिस्सा बन जाते हैं।

B. सीधे सच बता दूँगा — सत्य गीता के करीब है। पर 17.15 कहता है कि सच भी ऐसे बोला जाए जो उद्वेग न करे और हित करे — किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं।

C. पहले दोस्त से बात करूँगा — यह सच्ची दोस्ती के करीब है — गीता भगवान को “सुहृद” यानी बिना स्वार्थ के भला चाहने वाला कहती है (5.29)। असली दोस्त वही है जो ग़लती छिपाए नहीं, सुधारने में साथ दे (5.25)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 16.2 श्रीकृष्ण

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

हिंदी अर्थअहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव।

रोमन में पढ़ें

ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam
dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 5.29 श्रीकृष्ण

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥

हिंदी अर्थभक्त मुझे सब यज्ञों और तपोंका भोक्ता, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

bhoktāraṁ yajña-tapasāṁ sarva-loka-maheśhvaram
suhṛidaṁ sarva-bhūtānāṁ jñātvā māṁ śhāntim ṛichchhati

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 5.25 श्रीकृष्ण

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥

हिंदी अर्थजिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।

रोमन में पढ़ें

labhante brahma-nirvāṇam ṛiṣhayaḥ kṣhīṇa-kalmaṣhāḥ
chhinna-dvaidhā yatātmānaḥ sarva-bhūta-hite ratāḥ

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 18.63 श्रीकृष्ण

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥

हिंदी अर्थयह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।

रोमन में पढ़ें

iti te jñānam ākhyātaṁ guhyād guhyataraṁ mayā
vimṛiśhyaitad aśheṣheṇa yathechchhasi tathā kuru

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

सभी दुविधाएँ देखें · जीवन-विषयों से गीता