अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #33 · आस्था पूजा बनाम व्यस्तता

रोज़ पूजा-पाठ करना चाहते हैं, पर समय ही नहीं मिलता। आप क्या करेंगे?

सुबह की भागदौड़ में सब छूट जाता है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता भक्ति को समय-सारणी में नहीं बाँधती। जो कुछ भी किया जाए, भाव से अर्पित हो — अपने कर्म से भी ईश्वर का पूजन होता है (9.27, 18.46)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. जब समय होगा, तब करूँगा — गीता कहती है कि थोड़ा-सा साधन भी महान भय से रक्षा करता है (2.40) — “बाद में” का इंतज़ार ज़रूरी नहीं।

B. पूरा न हो सके तो कुछ नहीं — गीता विधि से ज़्यादा भाव देखती है — पत्र, पुष्प, फल, जल, जो भी प्रेम से अर्पित हो (9.26)।

C. जो भी करूँ, उसे अर्पण करूँगा — यह गीता के सबसे करीब है — जो कुछ करो, खाओ, दो, सब मुझे अर्पण करो (9.27); सब समय मेरा स्मरण करो और अपना काम भी करो (8.7)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 9.26 श्रीकृष्ण

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

हिंदी अर्थजो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ।

रोमन में पढ़ें

patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati
tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 9.27 श्रीकृष्ण

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।

रोमन में पढ़ें

yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat
yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 8.7 श्रीकृष्ण

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥

हिंदी अर्थइसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।

रोमन में पढ़ें

tasmāt sarveṣhu kāleṣhu mām anusmara yudhya cha
mayyarpita-mano-buddhir mām evaiṣhyasyasanśhayam

अध्याय 8 · अक्षरब्रह्मयोग
गीता 2.40 श्रीकृष्ण

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।

रोमन में पढ़ें

nehābhikrama-nāśho ’sti pratyavāyo na vidyate
svalpam apyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 18.46 श्रीकृष्ण

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam
sva-karmaṇā tam abhyarchya siddhiṁ vindati mānavaḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 12.10 श्रीकृष्ण

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥

हिंदी अर्थअगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा।

रोमन में पढ़ें

abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava
mad-artham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi

अध्याय 12 · भक्तियोग

सभी दुविधाएँ देखें · जीवन-विषयों से गीता