रोज़ पूजा-पाठ करना चाहते हैं, पर समय ही नहीं मिलता। आप क्या करेंगे?
सुबह की भागदौड़ में सब छूट जाता है।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता भक्ति को समय-सारणी में नहीं बाँधती। जो कुछ भी किया जाए, भाव से अर्पित हो — अपने कर्म से भी ईश्वर का पूजन होता है (9.27, 18.46)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. जब समय होगा, तब करूँगा — गीता कहती है कि थोड़ा-सा साधन भी महान भय से रक्षा करता है (2.40) — “बाद में” का इंतज़ार ज़रूरी नहीं।
B. पूरा न हो सके तो कुछ नहीं — गीता विधि से ज़्यादा भाव देखती है — पत्र, पुष्प, फल, जल, जो भी प्रेम से अर्पित हो (9.26)।
C. जो भी करूँ, उसे अर्पण करूँगा — यह गीता के सबसे करीब है — जो कुछ करो, खाओ, दो, सब मुझे अर्पण करो (9.27); सब समय मेरा स्मरण करो और अपना काम भी करो (8.7)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
इन श्लोकों में देखें
इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक
गीता 9.26श्रीकृष्ण
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
हिंदी अर्थजो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ।
रोमन में पढ़ें
patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati
tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ
हिंदी अर्थइसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।
रोमन में पढ़ें
tasmāt sarveṣhu kāleṣhu mām anusmara yudhya cha
mayyarpita-mano-buddhir mām evaiṣhyasyasanśhayam
गीता 2.40श्रीकृष्ण
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।
हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।