अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #17 · काम मेहनत बनाम मान्यता

आपसे कम काम करने वाले साथी को प्रमोशन मिल गया। आप क्या करेंगे?

मेहनत का फल न दिखे, तो सबसे पहले मन में सवाल आता है — फ़ायदा ही क्या?

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता कहती है — कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं (2.47)। इसका अर्थ अन्याय चुपचाप सहना नहीं; अर्थ है कि आपकी मेहनत की क़ीमत आपकी नज़र में दूसरों के फ़ैसले से तय न हो।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. नौकरी छोड़ दूँगा — गुस्से या चोट में लिया फ़ैसला अक्सर “राजस” होता है (18.27 — हर्ष-शोक से भरा कर्ता)। छोड़ना गलत नहीं, पर विवेक से हो, चोट से नहीं (18.30)।

B. मेहनत कम कर दूँगा — गीता कहती है कर्म न करने से करना श्रेष्ठ है (3.8), और फल न मिलने पर कर्म ढीला करना फल की आसक्ति ही है (2.47)।

C. बॉस से बात करके वजह समझूँगा — यह विवेकपूर्ण है — सात्त्विक बुद्धि कर्तव्य-अकर्तव्य को ठीक से समझती है (18.30)। जानकारी लेकर निर्णय, भावना में नहीं।

D. पहले की तरह काम करता रहूँगा — कर्म जारी रखना गीता के अनुरूप है (2.47)। बस यह अपमान दबाकर नहीं, सम-भाव से हो (12.18–19)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 2.47 श्रीकृष्ण

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

हिंदी अर्थकर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।

रोमन में पढ़ें

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.48 श्रीकृष्ण

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 3.8 श्रीकृष्ण

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

हिंदी अर्थतू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।

रोमन में पढ़ें

niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ
śharīra-yātrāpi cha te na prasiddhyed akarmaṇaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 18.27 श्रीकृष्ण

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥

हिंदी अर्थजो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

rāgī karma-phala-prepsur lubdho hinsātmako ‘śhuchiḥ
harṣha-śhokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.30 श्रीकृष्ण

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।

रोमन में पढ़ें

pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhaye
bandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 12.18 से 12.19 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥

हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

रोमन में पढ़ें

samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग

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