अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #38 · परिवार प्रेम बनाम परिवार

आप किसी से प्रेम करते हैं और शादी करना चाहते हैं, पर घर वाले बिल्कुल तैयार नहीं। आप क्या करेंगे?

एक तरफ़ जिसके साथ जीवन बिताना है, दूसरी तरफ़ वे जिन्होंने जीवन दिया।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता शादी पर कोई फ़ैसला नहीं सुनाती। वह कहती है कि निर्णय मोह, डर या ज़िद से नहीं, शांत बुद्धि से हो (2.7, 18.63) — और किसी के प्रति द्वेष या कठोर वाणी के बिना (12.13, 17.15)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. घर वालों की बात मान लूँगा — परिवार का आदर गीता में बड़ा मूल्य है। पर अर्जुन भी अपनों के मोह में उलझे थे, और उन्होंने खुद माना कि मोह ने उनकी समझ ढक दी थी (2.7)। फ़ैसला डर से नहीं, समझ से हो।

B. घर वालों के बिना शादी कर लूँगा — फ़ैसला आपका है — कृष्ण ने भी अंत में अर्जुन से यही कहा (18.63)। पर गीता कहती है कि किसी के प्रति द्वेष न रहे (12.13) और वाणी चोट न करे (17.15)। रिश्ते तोड़कर लिया फ़ैसला बाद में भारी पड़ सकता है।

C. धैर्य से समझाऊँगा, दोनों को जोड़ूँगा — यह गीता के करीब है — दूसरे के डर और दुख को अपना समझकर (6.32) बात करना, और नतीजे की जल्दबाज़ी छोड़कर सम रहना (2.48)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 2.7 अर्जुन

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥

हिंदी अर्थकायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।

रोमन में पढ़ें

kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥ
pṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥ
yach-chhreyaḥ syānniśhchitaṁ brūhi tanme
śhiṣhyaste ’haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 18.63 श्रीकृष्ण

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥

हिंदी अर्थयह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।

रोमन में पढ़ें

iti te jñānam ākhyātaṁ guhyād guhyataraṁ mayā
vimṛiśhyaitad aśheṣheṇa yathechchhasi tathā kuru

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 6.32 श्रीकृष्ण

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन ! जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है।

रोमन में पढ़ें

ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśhyati yo ’rjuna
sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 2.48 श्रीकृष्ण

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 12.13 श्रीकृष्ण

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

हिंदी अर्थसब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।

रोमन में पढ़ें

adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha
nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग

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