प्रतियोगी परीक्षा में दूसरी बार भी सफलता नहीं मिली। आप क्या करेंगे?
घर वाले, दोस्त — सबकी नज़रें सवाल करती लगती हैं।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता कहती है कि कल्याण के रास्ते पर किया कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता (6.40)। सफलता-असफलता में सम रहना ही योग है (2.48)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. अब छोड़ दूँगा — छोड़ना कभी-कभी सही होता है, पर हार की चोट में नहीं। गीता कहती है अच्छा प्रयास कभी नष्ट नहीं होता (6.40) — जो सीखा वह आगे काम आता है (6.43)।
B. एक बार और, पूरी तैयारी से — यह धैर्य और उत्साह वाला सात्त्विक भाव है (18.26)। बस परिणाम को अपनी पहचान न बनाएँ (2.48)।
C. दूसरा रास्ता चुनूँगा — राह बदलना हार नहीं, विवेक भी हो सकता है — अगर वह अपने स्वभाव की समझ से हो (18.47), डर से नहीं।
D. कुछ समय रुककर सोचूँगा — ठहरकर सोचना अच्छा है — सात्त्विक बुद्धि कर्तव्य-अकर्तव्य पहचानती है (18.30)। बस ठहराव टालमटोल न बने (18.28)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati
हिंदी अर्थहे कुरुनन्दन ! वहाँपर उसको पूर्वजन्मकृत साधन-सम्पत्ति अनायास ही प्राप्त हो जाती है। फिर उससे वह साधनकी सिद्धिके विषयमें पुनः विशेषतासे यत्न करता है।
रोमन में पढ़ें
tatra taṁ buddhi-sanyogaṁ labhate paurva-dehikam
yatate cha tato bhūyaḥ sansiddhau kuru-nandana
हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।