अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #27 · पढ़ाई हार बनाम फिर से कोशिश

प्रतियोगी परीक्षा में दूसरी बार भी सफलता नहीं मिली। आप क्या करेंगे?

घर वाले, दोस्त — सबकी नज़रें सवाल करती लगती हैं।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता कहती है कि कल्याण के रास्ते पर किया कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता (6.40)। सफलता-असफलता में सम रहना ही योग है (2.48)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. अब छोड़ दूँगा — छोड़ना कभी-कभी सही होता है, पर हार की चोट में नहीं। गीता कहती है अच्छा प्रयास कभी नष्ट नहीं होता (6.40) — जो सीखा वह आगे काम आता है (6.43)।

B. एक बार और, पूरी तैयारी से — यह धैर्य और उत्साह वाला सात्त्विक भाव है (18.26)। बस परिणाम को अपनी पहचान न बनाएँ (2.48)।

C. दूसरा रास्ता चुनूँगा — राह बदलना हार नहीं, विवेक भी हो सकता है — अगर वह अपने स्वभाव की समझ से हो (18.47), डर से नहीं।

D. कुछ समय रुककर सोचूँगा — ठहरकर सोचना अच्छा है — सात्त्विक बुद्धि कर्तव्य-अकर्तव्य पहचानती है (18.30)। बस ठहराव टालमटोल न बने (18.28)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 6.40 श्रीकृष्ण

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.43 श्रीकृष्ण

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥

हिंदी अर्थहे कुरुनन्दन ! वहाँपर उसको पूर्वजन्मकृत साधन-सम्पत्ति अनायास ही प्राप्त हो जाती है। फिर उससे वह साधनकी सिद्धिके विषयमें पुनः विशेषतासे यत्न करता है।

रोमन में पढ़ें

tatra taṁ buddhi-sanyogaṁ labhate paurva-dehikam
yatate cha tato bhūyaḥ sansiddhau kuru-nandana

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 2.48 श्रीकृष्ण

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 18.26 श्रीकृष्ण

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ
siddhy-asiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika uchyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.47 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
svabhāva-niyataṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.30 श्रीकृष्ण

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।

रोमन में पढ़ें

pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhaye
bandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.28 श्रीकृष्ण

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

ayuktaḥ prākṛitaḥ stabdhaḥ śhaṭho naiṣhkṛitiko ‘lasaḥ
viṣhādī dīrgha-sūtrī cha kartā tāmasa uchyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

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