अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #18 · काम सुरक्षा बनाम जोखिम

पक्की नौकरी है, पर मन अपना काम शुरू करने का है। आप क्या करेंगे?

एक तरफ़ हर महीने की निश्चित तनख़्वाह, दूसरी तरफ़ अपना सपना।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता साहस और विवेक, दोनों साथ चाहती है। अपने स्वभाव के अनुसार राह चुनना श्रेष्ठ है (18.47), पर बिना सोचे-समझे छलांग लगाना तामस है (18.25)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. नौकरी नहीं छोड़ूँगा — सुरक्षा चुनना गलत नहीं। पर अगर वजह सिर्फ़ डर है, तो गीता याद दिलाती है कि डर से कर्म छोड़ना राजस त्याग है (18.8)।

B. सब छोड़कर कूद जाऊँगा — उत्साह अच्छा है, पर गीता उस कर्म को तामस कहती है जो परिणाम, हानि और अपनी सामर्थ्य देखे बिना शुरू किया जाए (18.25)।

C. तैयारी करके धीरे-धीरे शुरू करूँगा — यह सात्त्विक कर्ता के करीब है — धैर्य और उत्साह, दोनों के साथ (18.26), और अपने स्वभाव के अनुरूप राह (18.47)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 18.8 श्रीकृष्ण

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥

हिंदी अर्थजो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता।

रोमन में पढ़ें

duḥkham ity eva yat karma kāya-kleśha-bhayāt tyajet
sa kṛitvā rājasaṁ tyāgaṁ naiva tyāga-phalaṁ labhet

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.25 श्रीकृष्ण

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anubandhaṁ kṣhayaṁ hinsām anapekṣhya cha pauruṣham
mohād ārabhyate karma yat tat tāmasam uchyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.26 श्रीकृष्ण

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ
siddhy-asiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika uchyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.47 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
svabhāva-niyataṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.30 श्रीकृष्ण

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।

रोमन में पढ़ें

pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhaye
bandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

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