अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #43 · रिश्ते और दोस्ती अहंकार बनाम माफ़ी

गुस्से में आपने किसी अपने को ऐसी बात कह दी जिससे उनका दिल दुखा। अब माफ़ी माँगें या बात को वैसे ही छोड़ दें?

ग़लती दोनों तरफ़ से थी — पर जो शब्द आपने कहे, वे ज़्यादा चुभे।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता अहंकार को बंधन और विनम्रता को ज्ञान का लक्षण मानती है (3.27, 13.7)। अपनी ग़लती मान लेना हार नहीं — यह वही सरलता है जिसे गीता दैवी गुण कहती है (16.3)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. मैं क्यों झुकूँ? — गीता कहती है कि अहंकार से मोहित मनुष्य ही सोचता है “सब मैं ही करता हूँ” (3.27), और अभिमान-कठोरता को आसुरी लक्षण गिनाती है (16.4)। “पहले वो झुकें” — यही अहंकार रिश्ते में दीवार बनता है।

B. कुछ नहीं कहूँगा — समय घाव भरता है, पर बिना कहे शब्द मन में पड़े रहते हैं। गीता वाणी के तप में सत्य और हित की बात करती है (17.15) — कभी-कभी सबसे हितकारी बात बस “माफ़ करना” होती है।

C. जाकर माफ़ी माँग लूँगा — यह गीता के करीब है — “मानित्व” यानी अपने को बड़ा मानने का भाव न होना, और सरलता, ज्ञान के लक्षण हैं (13.7)। क्षमा और अभिमान का न होना दैवी गुण है (16.3)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 3.27 श्रीकृष्ण

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥

हिंदी अर्थसम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।

रोमन में पढ़ें

prakṛiteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśhaḥ
ahankāra-vimūḍhātmā kartāham iti manyate

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 16.4 श्रीकृष्ण

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

रोमन में पढ़ें

dambho darpo ’bhimānaśh cha krodhaḥ pāruṣhyam eva cha
ajñānaṁ chābhijātasya pārtha sampadam āsurīm

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 13.7 श्रीकृष्ण

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥

हिंदी अर्थमानित्व-(अपनेमें श्रेष्ठताके भाव-) का न होना, दम्भित्व-(दिखावटीपन-) का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, स्थिरता और मनका वशमें होना।

रोमन में पढ़ें

amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam
āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ

अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
गीता 16.3 श्रीकृष्ण

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥

हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

रोमन में पढ़ें

tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā
bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

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