गुस्से में आपने किसी अपने को ऐसी बात कह दी जिससे उनका दिल दुखा। अब माफ़ी माँगें या बात को वैसे ही छोड़ दें?
ग़लती दोनों तरफ़ से थी — पर जो शब्द आपने कहे, वे ज़्यादा चुभे।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता अहंकार को बंधन और विनम्रता को ज्ञान का लक्षण मानती है (3.27, 13.7)। अपनी ग़लती मान लेना हार नहीं — यह वही सरलता है जिसे गीता दैवी गुण कहती है (16.3)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. मैं क्यों झुकूँ? — गीता कहती है कि अहंकार से मोहित मनुष्य ही सोचता है “सब मैं ही करता हूँ” (3.27), और अभिमान-कठोरता को आसुरी लक्षण गिनाती है (16.4)। “पहले वो झुकें” — यही अहंकार रिश्ते में दीवार बनता है।
B. कुछ नहीं कहूँगा — समय घाव भरता है, पर बिना कहे शब्द मन में पड़े रहते हैं। गीता वाणी के तप में सत्य और हित की बात करती है (17.15) — कभी-कभी सबसे हितकारी बात बस “माफ़ करना” होती है।
C. जाकर माफ़ी माँग लूँगा — यह गीता के करीब है — “मानित्व” यानी अपने को बड़ा मानने का भाव न होना, और सरलता, ज्ञान के लक्षण हैं (13.7)। क्षमा और अभिमान का न होना दैवी गुण है (16.3)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थसम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।
हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।
रोमन में पढ़ें
dambho darpo ’bhimānaśh cha krodhaḥ pāruṣhyam eva cha
ajñānaṁ chābhijātasya pārtha sampadam āsurīm
हिंदी अर्थमानित्व-(अपनेमें श्रेष्ठताके भाव-) का न होना, दम्भित्व-(दिखावटीपन-) का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, स्थिरता और मनका वशमें होना।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।