अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #30 · समाज मन की बात बनाम लोगों का डर

आप कुछ नया करना चाहते हैं — इस उम्र में पढ़ाई, कोई शौक — पर डर है कि लोग हँसेंगे। आप क्या करेंगे?

“लोग क्या कहेंगे” — शायद सबसे पुराना डर।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता के अनुसार जिसने अपने मन को जीत लिया, वह मान-अपमान में विचलित नहीं होता (6.7)। दूसरों की राय आपकी राह तय न करे।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. नहीं करूँगा — गीता कहती है स्थिर व्यक्ति निंदा-स्तुति को समान समझता है (12.18–19)। दूसरों की हँसी का डर अपनी राह से दूर ले जाता है (3.35)।

B. करूँगा, पर चुपके से — करना अच्छा है — पर छिपाना बताता है कि डर अभी बाक़ी है। गीता “अभय” को पहला दैवी गुण कहती है (16.1)।

C. खुलकर करूँगा — यह गीता के करीब है — मान-अपमान में सम (6.7) और अपनी राह पर टिकना (3.35)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 6.7 श्रीकृष्ण

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥

हिंदी अर्थजिसने अपने-आपपर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।

रोमन में पढ़ें

jitātmanaḥ praśhāntasya paramātmā samāhitaḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu tathā mānāpamānayoḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 12.18 से 12.19 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥

हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

रोमन में पढ़ें

samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 14.24 से 14.25 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ 14.24 ॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ 14.25 ॥

हिंदी अर्थजो धीर मनुष्य सुख-दुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रिय-अप्रियमें तथा अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है; जो मान-अपमानमें तथा मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ
tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-sanstutiḥ
mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāri-pakṣhayoḥ
sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa uchyate

अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
गीता 16.1 श्रीकृष्ण

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥

हिंदी अर्थभयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।

रोमन में पढ़ें

śhrī-bhagavān uvācha
abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ
dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 3.35 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग

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