अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #12 · मन और आदतें आज बनाम कल

एक ज़रूरी काम है, पर मन कह रहा है “कल कर लूँगा” — और यह तीसरी बार है। आप क्या करेंगे?

टालमटोल अक्सर आराम जैसा लगता है, पर काम का बोझ बढ़ता जाता है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता आलस्य को सुख का धोखा बताती है — निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उपजा सुख आरंभ में भी और अंत में भी मोहित करता है (18.39)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. कल ही करूँगा — गीता काम टालने वाले (दीर्घसूत्री) को तामस कर्ता कहती है (18.28), और प्रमाद-आलस्य को तमोगुण का बंधन (14.8)।

B. आज ज़बरदस्ती पूरा करूँगा — कर्म करना गीता के अनुरूप है (3.8), पर 6.16 कहता है — न बहुत सोने वाले का योग सिद्ध होता है, न बिलकुल न सोने वाले का।

C. अभी छोटा-सा हिस्सा शुरू करूँगा — यह “धैर्य और उत्साह” वाले सात्त्विक कर्ता के करीब है (18.26)। और कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है (3.8)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 18.28 श्रीकृष्ण

अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

ayuktaḥ prākṛitaḥ stabdhaḥ śhaṭho naiṣhkṛitiko ‘lasaḥ
viṣhādī dīrgha-sūtrī cha kartā tāmasa uchyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 14.8 श्रीकृष्ण

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥

हिंदी अर्थहे भरतवंशी अर्जुन ! सम्पूर्ण देहधारियोंको मोहित करनेवाले तमोगुणको तुम अज्ञानसे उत्पन्न होनेवाला समझो। वह प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा देहधारियोंको बाँधता है।

रोमन में पढ़ें

tamas tv ajñāna-jaṁ viddhi mohanaṁ sarva-dehinām
pramādālasya-nidrābhis tan nibadhnāti bhārata

अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
गीता 3.8 श्रीकृष्ण

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

हिंदी अर्थतू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।

रोमन में पढ़ें

niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ
śharīra-yātrāpi cha te na prasiddhyed akarmaṇaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 18.26 श्रीकृष्ण

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ
siddhy-asiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika uchyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.39 श्रीकृष्ण

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थनिद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न होनेवाला जो सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है, वह सुख तामस कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

yad agre chānubandhe cha sukhaṁ mohanam ātmanaḥ
nidrālasya-pramādotthaṁ tat tāmasam udāhṛitam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 6.16 श्रीकृष्ण

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है।

रोमन में पढ़ें

nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ
na chāti-svapna-śhīlasya jāgrato naiva chārjuna

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.17 श्रीकृष्ण

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

रोमन में पढ़ें

yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu
yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā

अध्याय 6 · ध्यानयोग

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