अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #19 · काम काम बनाम परिवार का समय

काम इतना है कि परिवार के लिए समय ही नहीं बचता। आप क्या करेंगे?

देर रात तक काम, छुट्टी के दिन भी फ़ोन — और घर पर शिकायतें।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता कहती है कि योग उसी का सिद्ध होता है जिसका खाना, सोना, काम और आराम — सब संतुलित हो (6.16–17)। अति कर्म भी असंतुलन है।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. पहले करियर, परिवार बाद में — गीता कर्म को ज़रूरी मानती है, पर “युक्त चेष्टा” — यथायोग्य प्रयास — की बात करती है, अति की नहीं (6.17)।

B. काम कम करके परिवार को समय दूँगा — संतुलन चाहना गीता के अनुरूप है (6.16–17)। बस यह कर्तव्य से भागना न बने (3.8)।

C. दोनों का समय तय करूँगा — यह “युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु” के सबसे करीब है — आहार, विहार, कर्म और नींद, सबमें यथायोग्य (6.17)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 6.16 श्रीकृष्ण

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है।

रोमन में पढ़ें

nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ
na chāti-svapna-śhīlasya jāgrato naiva chārjuna

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.17 श्रीकृष्ण

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

रोमन में पढ़ें

yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu
yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 3.8 श्रीकृष्ण

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥

हिंदी अर्थतू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।

रोमन में पढ़ें

niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ
śharīra-yātrāpi cha te na prasiddhyed akarmaṇaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 2.50 श्रीकृष्ण

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥

हिंदी अर्थबुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।

रोमन में पढ़ें

buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛita-duṣhkṛite
tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśhalam

अध्याय 2 · सांख्ययोग

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