अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #22 · पैसा लालच बनाम समझ

एक स्कीम का वादा है — पैसा कुछ ही महीनों में दोगुना। आप क्या करेंगे?

जान-पहचान के लोग भी इसमें पैसा लगा रहे हैं।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता कोई निवेश सलाह नहीं देती, पर लालच की पहचान साफ़ बताती है — जो आरंभ में अमृत जैसा और परिणाम में विष जैसा हो (18.38)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. लगा दूँगा — गीता लोभ को नरक का द्वार (16.21) और रजोगुण का लक्षण (14.12) कहती है। जो सुख पहले अमृत और बाद में विष लगे, वह राजस है (18.38)।

B. पहले पूरी जाँच करूँगा — यह विवेक है — गीता बिना परिणाम और हानि देखे शुरू किए कर्म को तामस कहती है (18.25)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 16.21 श्रीकृष्ण

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

हिंदी अर्थकाम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।

रोमन में पढ़ें

tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśhanam ātmanaḥ
kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 14.12 श्रीकृष्ण

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥

हिंदी अर्थहे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

रोमन में पढ़ें

lobhaḥ pravṛittir ārambhaḥ karmaṇām aśhamaḥ spṛihā
rajasy etāni jāyante vivṛiddhe bharatarṣhabha

अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
गीता 18.38 श्रीकृष्ण

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थजो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

viṣhayendriya-sanyogād yat tad agre ’mṛitopamam
pariṇāme viṣham iva tat sukhaṁ rājasaṁ smṛitam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.25 श्रीकृष्ण

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anubandhaṁ kṣhayaṁ hinsām anapekṣhya cha pauruṣham
mohād ārabhyate karma yat tat tāmasam uchyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 16.12 श्रीकृष्ण

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥

हिंदी अर्थवे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।

रोमन में पढ़ें

āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ
īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

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