घर वाले आपके लिए एक बड़ा फ़ैसला ले रहे हैं, पर आप उससे सहमत नहीं। आप क्या करेंगे?
शहर बदलना, नौकरी, पढ़ाई — बड़ों का अनुभव और अपनी समझ कई बार अलग दिशा में जाते हैं।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता आदर और सत्य, दोनों को साथ रखती है। अपनी बात कहना गलत नहीं — पर वह कड़वाहट से नहीं, विवेक और मधुरता से कही जाए।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. चुपचाप मान लूँगा — बड़ों का आदर गीता भी सिखाती है — गुरुजनों का पूजन शरीर का तप है (17.14)। पर भीतर जमा नाराज़गी राग-द्वेष बनकर मन की ही शत्रु बनती है (3.34)।
B. साफ़ मना कर दूँगा — अपने स्वभाव के अनुसार राह चुनने को गीता महत्व देती है (18.47), पर कठोरता को नहीं — वाणी का तप कहता है कि बात सच्ची हो, पर उद्वेग न करे (17.15)।
C. बैठकर अपनी बात विनम्रता से रखूँगा — यह गीता के “वाणी के तप” के सबसे करीब है — सत्य, प्रिय और हितकारी बात, बिना किसी को आहत किए (17.15)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
इन श्लोकों में देखें
इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक
गीता 17.14श्रीकृष्ण
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥
हिंदी अर्थदेवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुषका पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्यका पालन करना और हिंसा न करना -- यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है।
रोमन में पढ़ें
deva-dwija-guru-prājña- pūjanaṁ śhaucham ārjavam
brahmacharyam ahinsā cha śhārīraṁ tapa uchyate
हिंदी अर्थइन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।
रोमन में पढ़ें
indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau
tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau
हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।