अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #13 · परिवार आदर बनाम अपनी बात

घर वाले आपके लिए एक बड़ा फ़ैसला ले रहे हैं, पर आप उससे सहमत नहीं। आप क्या करेंगे?

शहर बदलना, नौकरी, पढ़ाई — बड़ों का अनुभव और अपनी समझ कई बार अलग दिशा में जाते हैं।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता आदर और सत्य, दोनों को साथ रखती है। अपनी बात कहना गलत नहीं — पर वह कड़वाहट से नहीं, विवेक और मधुरता से कही जाए।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. चुपचाप मान लूँगा — बड़ों का आदर गीता भी सिखाती है — गुरुजनों का पूजन शरीर का तप है (17.14)। पर भीतर जमा नाराज़गी राग-द्वेष बनकर मन की ही शत्रु बनती है (3.34)।

B. साफ़ मना कर दूँगा — अपने स्वभाव के अनुसार राह चुनने को गीता महत्व देती है (18.47), पर कठोरता को नहीं — वाणी का तप कहता है कि बात सच्ची हो, पर उद्वेग न करे (17.15)।

C. बैठकर अपनी बात विनम्रता से रखूँगा — यह गीता के “वाणी के तप” के सबसे करीब है — सत्य, प्रिय और हितकारी बात, बिना किसी को आहत किए (17.15)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 17.14 श्रीकृष्ण

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थदेवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुषका पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्यका पालन करना और हिंसा न करना -- यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

deva-dwija-guru-prājña- pūjanaṁ śhaucham ārjavam
brahmacharyam ahinsā cha śhārīraṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 3.34 श्रीकृष्ण

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥

हिंदी अर्थइन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।

रोमन में पढ़ें

indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau
tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 18.47 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
svabhāva-niyataṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 16.2 श्रीकृष्ण

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

हिंदी अर्थअहिंसा, सत्यभाषण; क्रोध न करना; संसारकी कामनाका त्याग; अन्तःकरणमें राग-द्वेषजनित हलचलका न होना; चुगली न करना; प्राणियोंपर दया करना सांसारिक विषयोंमें न ललचाना; अन्तःकरणकी कोमलता; अकर्तव्य करनेमें लज्जा; चपलताका अभाव।

रोमन में पढ़ें

ahinsā satyam akrodhas tyāgaḥ śhāntir apaiśhunam
dayā bhūteṣhv aloluptvaṁ mārdavaṁ hrīr achāpalam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.3 श्रीकृष्ण

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥

हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

रोमन में पढ़ें

tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā
bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

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